Lawyer since 1978. Interest in writing, litrary-cultural-social activities.
1978 से वकील। साहित्य, कानून, समाज, पठन,सामाजिक संगठन लेखन,साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि।
कोई भी पाठकसामान्य अथवा व्यक्तिगत कानूनी सलाह प्राप्त करना चाहे तो वह ऊपर या नीचे बने आयत पर क्लिक कर अपनी समस्या/प्रश्न हमें प्रेषित कर सकता है। हल तीसरा खंबा पर प्रकाशित किया जाएगा, अथवा बहुत वैयक्तिक होने पर पाठक के मेल पते पर प्रेषित किया जाएगा। -दिनेशराय द्विवेदी
मेहसाणा गुजरात के एक वकील कमलेश सुखाड़िया ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक कानूनी नोटिस भेज कर पूछा है कि तंबाकू उत्पाद और कैंसर के लिए उत्तरदायी गोआ ब्रांड गुटखा के पाउच को 'गुजरात नूँ गौरव, केसर युक्त गुटखा' कह कर बेचे जाने की अनुमति कैसे दी जा रही है?
नोटिस में कहा गया है कि जहाँ तंबाकू के उपभोग को सीमित करने के लिए लाखों रुपया विज्ञापन पर खर्च किया जा रहा है इस गुटखा कंपनी को अपना तंबाकू उत्पाद पाउच पर गुजरात का गौरव के नाम से बेचने की अनुमति देना कितना उचित है? सुखाड़िया ने नोटिस में मांग की है कि गुजरात का गौरव जैसे विशेषण के साथ तंबाकू उत्पाद बेचने वाली कंपनी के विरुद्ध अविलंब आवश्यक कार्यवाही की जाए।
वकील सुखाड़िया ने गोआ गुटखा के उत्पादक रॉयल मारवाड़ टोबेको प्रोड्यूसर्स लि. को भी नोटिस भेज कर पूछा है कि वे कैसे एक कैंसर पैदा करने वाले उत्पाद को गुजरात नूँ गौरव के नाम से बेच रहे हैं, क्या इस का अर्थ यह है कि कैंसर गुजरात के लिए गौरव है?
यह जानना दिलचस्प होगा कि गोआ गुटखा की उत्पादक कंपनी इस नोटिस का क्या उत्तर देती है और गुजरात के गौरव के इस दुरुपयोग के प्रति मोदी सरकार क्या रवैया अपनाती है, और इस कंपनी के विरुद्ध क्या कार्यवाही करती है? गोआ गुटखा के निर्माता पहले भी मुंबई सीरियल ब्लास्ट में संबंधों के कारण तथा अपनी पुत्री के प्रेमी की हत्या के मामले में चर्चित रहे हैं।
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27 जुलाई को प्रेसिडेंट पंचायत यूनियन कौंसिल बनाम पी.के मुथुस्वामी एवं अन्य के मामले में विशेष अनुमति याचिका को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह बात पुनः कही कि न्यायपालिका को सामान्यतः कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
मामला यह था कि तमिलनाड़ु के धरमपुरी जिले के पैन्नागरम तालुका में मुंसिफ कम ज्युडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत के लिए अदालत भवन की आवश्यकता थी। मद्रास उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि प्रखंड विकास अधिकारी के कार्यालय की पुरानी इमारत इस अदालत के लिए आवंटित की जाए। इस के विरुद्ध राज्य सरकार ने यह विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की।
अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह सही है कि मुंसिफ कोर्ट को उपयुक्त भवन की आवश्यकता है लेकिन सरकार से भवन प्राप्त करने के लिए आवेदन करना चाहिए न कि इस तरह सरकार को आदेश दिया जाना चाहिए। इस तरह का आदेश पारित कर उच्चन्यायालय ने अपने क्षेत्राधिकार से बाहर का कार्य किया है। इस कारण यह आदेश निरस्त किया जाता है। तदुपरांत सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश दिया कि इस निर्णय की एक प्रतिलिपि राज्य के मुख्य सचिव को भेजी जाए। हम मुख्य सचिव से निवेदन करते हैं कि वे उच्चन्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल से उस मामले को तुरंत वार्ता कर हल करें और दो माह में समस्या का हल निकालें।
अब आप ने किसी को रुपया उधार दिया है, उधार देने की लिखत भी आप के पास मौजूद है और रसीद भी। उधार दिया रुपया वापस आने का समय बीत चुका है और चुकाने वाला आप से आज-कल, आज-कल कर रहा है। आप उसे समय दिए जा रहे हैं। अंततः आप उस पर मुकदमा करने का मन बना लेते हैं और अपने पास के कागजात ले किसी वकील से मिलते हैं। वकील आप को बताता है कि आप उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा नहीं कर सकते? आप पूछते हैं- क्यों? जवाब मिलता है कि मुकदमा दायर करने की मियाद निकल चुकी है। आप निराश हो जाते हैं। वस्तुतः न्याय इस आधारभूत सिद्धान्त पर न्याय करता है कि न्याय प्राप्त करने वाले को न्याय प्राप्त करने के लिए अर्जी या दावा पेश करने में देरी नहीं करनी चाहिए अपितु उसे तुरंत अदालत के सामने जाना चाहिए। कम से कम निर्धारित समयावधि के भीतर ही अदालत में कार्यवाही कर देनी चाहिए।
आप यदि न्यायालय के समक्ष जाने में जितनी देरी करते हैं उतने ही न्याय से दूर होते चले जाते हैं। कुछ समय बाद यह दूरी इतनी हो जाती है कि आप कभी न्याय प्राप्त नहीं कर सकते। भारत में विभिन्न तरह के दावे पेश करने के लिए निर्धारित समयावधि निश्चित किए जाने के लिए कानून बना है जो मियाद अधिनियम, अवधि अधिनियम या लिमिटेशन एक्ट कहलाता है। इस कानून के साथ एक अनुसूची संलग्न की गई है जिस में दिया गया है कि किस किस तरह के मामलों के लिए क्या क्या अवधि निर्धारित की गई है। इस अनुसूची में कुल 137 बिंदु हैं। इस लिए इस ब्लाग की सीमा में यह तो संभव नहीं है कि यह बताया जा सके कि कौन से मामले में मुकदमा करने के लिए क्या मियाद निर्धारित की गई है? और मियाद कब आरंभ होगी? हाँ आप चाहें तो इस सूची को निम्न वाक्य पर क्लिक कर के देख सकते हैं।
नोट-यह आलेख विशेष रूप से उड़नतश्तरी के ब्लागर समीर लाल जी को समर्पित है, कुछ माह पूर्व उन ने यह प्रश्न किया था कि क्या अलग अलग मामलों के लिए अलग अलग मियाद है? उत्तर देने में देरी हुई उस के लिए मैं उन से क्षमा प्रार्थी हूँ।
मेरी उम्र चालीस वर्ष है, मेरे पाँच बच्चे और पति अपंग हैं। मैं मुम्बई में रहती हूँ। पड़ौसी के यहाँ झगड़ा हुआ, आजू-बाजू वालों से लड़ाई हो रही थी। दोनों सगे भाई थे, पेट में चाकू लग गया था। तो जिस को मार लगी उस ने पहले पुलिस को झूठी शिकायत दी कि मैं ने उस को पकड़ कर रखा था तो गुंडे ने उस को चाकू मारा, जब कि मैं वहाँ थी ही नहीं। फिर भी मेरा झूठा नाम पुलिस को दे दिया। बताओ मैं क्या करूँ। सामने वाले ने मुझ पर 326 आईपीसी का केस बना दिया। मैं ने पुलिस को पूछा तो वह कहती है कि जिस आदमी को मार लगी वो जो भी कहेगा हमें उस का यकीन करना होगा, हम कुछ नहीं कर सकते। कोर्ट में जा कर कहो कि आप बेकसूर हैं। बाकी के आरोपी गिरफ्तार हो गए हैं जिस ने चाकू मारा था वो भी पकड़ा गया।
आप बताएँ कि कोर्ट में कैसे जमानत ले सकती हूँ? और कैसे अपना बचाव कर सकती हूँ?
उत्तर
मुमताज बहन!
पुलिस वाले सही कह रहे हैं कि जब घायल व्यक्ति ने रिपोर्ट में ही आप का नाम लिखा दिया है तो वे कुछ नहीं कर सकते। क्यों कि प्रथम सूचना रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण सबूत होता है। फिर जिन गवाहों को पुलिस के सामने खड़ा किया गया होगा वे भी पुलिस के सामने अपने बयानों में यही कहेंगे। अब आप के पास इस बात का मजबूत तर्क और सबूत होना चाहिए कि आखिर घायल ने आप के मौके पर न होते हुए भी इस अपराध की रिपोर्ट करते समय आप को इस में फंसाने का कारण क्या रहा है? आप ने अपने सवाल में यह कहीं भी नहीं बताया है। हो सकता है किसी पुरानी घटना के कारण घायल फरियादी आप से गहरी रंजिश रखता हो, या कभी उन दोनों के बीच होने वाली जुबानी तकरारों के बीच आप चाकू मारने वाले का पक्ष लेती रही हों।
आप जब मौके पर थी ही नहीं तो उस घटना को देखने वाले किसी भी एक या अधिक लोगों का शपथ पत्र भी इस बात का पेश करने का अच्छा असर हो सकता है कि आप घटना के वक्त वहाँ थी ही नहीं और आप का नाम रंजिश के कारण फरियादी ने लिखा दिया है। इस के साथ ही आप के पास इस बात की कोई अच्छी वजह हो जिस के कारण फरियादी आप से रंजिश रखते हुए आप को फंसा सकता हो तो आप की गिरफ्तारी पूर्व अग्रिम जमानत हो सकती है। इस के लिए आप को इलाके की सेशन कोर्ट में दरख्वास्त लगानी पड़ेगी। यदि ऐसा नहीं है तो आप को अग्रिम जमानत मिल पाना लगभग असंभव है। अग्रिम जमानत कुछ खास मामलों में ही दी जाती है यह सब मामलों में संभव नहीं है।
यदि आप की अग्रिम जमानत नहीं होती है तो फिर आप की जमानत गिरफ्तारी के उपरांत ही हो सकेगी। उस के लिए पहले उस अदालत में जमानत की दरख्वास्त देनी पड़ेगी जहाँ आप को गिरफ्तार कर के पेश किया जाएगा। यदि यह अदालत आप की जमानत की दरख्वास्त खारिज कर देती है तो फिर सेशन कोर्ट में आप को दरख्वास्त देनी होगी जहाँ आप की दरख्वास्त अवश्य मंजूर हो जाएगी और आप को जमानत मिल जाएगी। दोनों ही मामलों में आप के पति का अपंग होना और पाँच बच्चे होने और उन्हें संभालने का दायित्व आप पर होने का तथ्य भी आप की मदद करेगा।
अब आप खुद सोच कर निर्णय कर सकती हैं कि आप को अग्रिम जमानत लेनी चाहिए या नहीं। क्यों कि यदि आप को अग्रिम जमानत न मिली तो आप का जो पैसा इस के लिए खर्च होगा वह बेकार चला जाएगा। दोनों ही हालत में आप को किसी न किसी वकील को करना ही पड़ेगा। इस लिए आप अपने इलाके की सेशनकोर्ट में फौजदारी की वकालत करने वाले किसी अच्छे वकील को मुकर्रर कर लें। वकील करने के पहले यह अवश्य जाँच लें कि वकील विश्वसनीय है या नहीं।
(छाया चित्र - छाया-चित्रकार सुनील दीपक के सौजन्य से)
तीसरा खंबा को कल कानूनी सलाह के लिए मेल में निम्नांकित संदेश मिला। इन पाठक की समस्या बहुत पीड़ामय है। जरा आप भी पढ़ें।
मेरी पत्नी के अपने जीजा के साथ शादी के पूर्व 15 सालों से और शादी के बाद इस तरह के नाजायज संबंध थे, जिस के मेरे पास पूरे सबूत भी हैं। वो डिप्रेशन की रोगी है, वो घर में दिन भर सोई रहती है। 10 बजे खाना बनाने जाती है जब कि मेरी ड्यूटी पर पहुँचने का समय 10.30 है। मेरी माँ को डिप्रेशन की हालत में घर से निकाल दिया। मेरे कुछ कहने पर उन्हों ने मुझ पर दहेज का केस कर दिया। मेरा चार साल का बेटा है इसलिए मैं उसे घर ले आया। लेकिन फिर भी उस में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। पिछले 18 महिनों से ऐसा नहीं है कि मैं कभी गुस्सा नहीं हुआ हूँ, दो या तीन बार मुझ से उस पर हाथ भी उठ गया है। लेकिन क्या करूँ वह बिलकुल भावनाहीन हो गई है। कितना भी समझाता हूँ कि तुम जल्दी उठा करो, बाहर घूमा करो, लेकिन कोई बात नहीं सुनती है। बच्चा रोज कोई नुकसान कर देता है लेकिन उसे कोई परवाह नहीं है। मैं अपनी पत्नी का इलाज कराता हूँ, बच्चे की तरह घुमाता हूँ। 18 महीनों में बहुत परेशान होने पर मै ने एक दो बार दो-तीन थप्पड़ मार दिया , तो क्या मैं ने इतना बड़ा गुनाह कर दिया कि उस के भाई बोले -रखा है तो ठीक से रखो वरना हाथ काट देंगे। वो पैसे वाले हैं और मैं एक नौकरी करने वाला आदमी हूँ। मेरी क्षमता न होते हुए भी मैं पत्नी की एक ऐसी बीमारी का इलाज करा रहा हूँ जो कि शादी के 15 साल पहले से थी। मुझे भी उच्च रक्तचाप रहने लगा है और अक्सर 190-110 रहता है। जिस से बात बर्दाश्त से बाहर हो जाती है तो गुस्सा आ जाता है। समझ में नहीं आता है क्या करूँ?
उत्तर ...............
प्रिय पाठक!
आप के प्रश्न से कहीं यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि आप इस समस्या के कानूनी हल के रुप में क्या चाहते हैं? आप अपने विरुद्ध दहेज के मुकदमे का सामना कर चुके हैं। आप के पास अपनी पत्नी के शादी के पहले और बाद के अपने जीजा के साथ नाजायज संबंधों के पक्के सबूत थे। आप चाहते तो उन के आधार पर अपनी पत्नी से तलाक ले सकते थे। आप ने वे सबूत भी अवश्य ही किसी वकील को बताए होंगे। यदि वे सबूत पर्याप्त होते तो आप का वकील आप को सलाह देता कि आप तलाक ले लीजिए। लेकिन आप ने ऐसा कुछ किया नहीं। इस से और आप के संदेश की भाषा से प्रतीत होता है कि आप ने उन सब के लिए पत्नी को माफ कर दिया है और आप ने उसे पुनः अपना लिया है, चाहे अपने इकलौते पुत्र की खातिर ही सही।
आप ने खुद ही बताया है कि आप की पत्नी डिप्रेशन की शिकार है और आप उस का इलाज करवा रहे हैं। आप ने उसे एक दो बार थप्पड़ भी मार दिया जिसे आप खुद स्वीकार करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा आप से उच्चरक्तचाप के कारण गुस्सा आने पर हो गया। यह खबर सुन कर आप की पत्नी के भाइयों ने आप को हाथ काटने की धमकी दे डाली। लगता है आप की पत्नी के भाई भी स्वभावतः उच्चरक्तचापी हैं और जैसा आप ने किया वैसा ही उन्हों ने आप को जवाब दे दिया। आप कहते हैं कि वे बहुत पैसे वाले हैं, लेकिन उन के व्यवहार से लगता नहीं है कि ऐसा है।
वास्तव में आप की समस्या कानूनी है ही नहीं। वह चिकित्सकीय और सामाजिक है। आप के इस पत्र से लगता है कि आप उच्चरक्तचाप के साथ-साथ डिप्रेशन के भी शिकार हो चुके हैं। आप अपनी पत्नी की चिकित्सा ठीक से करवाइए। मुझे लगता है कि उन्हें , और आप को भी किसी मनोचिकित्सक की आवश्यकता है। आप तुरंत किसी मनोचिकित्सक से मिलें और उन्हें अपनी हालत बताएँ, उन से सलाह लें। दूसरी बार में अपनी पत्नी को भी ले जाएँ। यदि मनोचिकित्सक को लगता है कि आप और आप की पत्नी उन की चिकित्सा से ठीक हो सकती है तो उन की और अपनी मनःचिकित्सा कराएँ।
जहाँ तक धन की कमी का प्रश्न है तो आज देश की 80 प्रतिशत जनता इस से जूझ रही है। आप अपनी पत्नी के भाइयों से संबंधों को सामान्य बनाएँ और सही हालत उन्हें भी बताएँ। मुझे विश्वास है कि इस समस्या के हल के लिए वे भी आप के साथ सहयोग करेंगे और आर्थिक मदद भी कर सकते हैं।
मैं ने अपने पाठक का नाम जानबूझ कर छिपाया है, जिस से उन की पहचान गोपनीय रहे। आप से अनुरोध है कि इन सज्जन की समस्या का हल कोई भी सुझा सकने की स्थिति में हो तो टिप्पणी के माध्यम से सुझाव देने का अनुग्रह करें।
आपका मशविरा समय पर मिल गया था। लेकिन स्वास्थ्य बहुत खराब हो जाने और तकरीबन १५ दिन अस्पताल में रहने की वजह से दीन दुनिया से ज़्यादा ही कटी रही। सर, दो साल होने को आये फैमिली कोर्ट में मामला जस का तस है। मैं हर पेशी पर पहुंचती हूं पर मेरे पति २-३ में से एक पर। उनका वकील तक नहीं आता है। मैं दिल्ली में भाई के पास हूं, हर हफ्ते भागना पड़ता है। अचरज इस बात पर होता है कि जज साहब भी कुछ नहीं कहते अगली तारीख लेने के लिये कह देते हैं। इतना उत्पीड़न तो मेरा ससुराल में भी नहीं हुआ। मैं दंग हूं जो दो गुंडे मुझे और मेरी मां को धमकाने के लिये घर पर आते रहे हैं, उनको ही मेरे पति ने अपनी तरफ से गवाह के तौर पर पेश कर दिया। मैंने अपने वकील को ये बात बताई तो वो टाल गये। मेरा पक्ष रखा जाना है, लेकिन तारीख टलती जी रही है। हर पेशी पर पति खुलेआम गंदी-गंदी गालियां देते हैं, चरित्र पर लांछन लगाते हैं, तबाह कर देने की, मरवा देने की धमकी देते हैं, और मैं सुनती रहती हूं। हर बार एक सुसाइड नोट दिखाते हैं, कहते हैं मैं मर जाऊंगा और तेरे पूरे परिवार को फंसा जाउंगा। क्या मेरी वजह से मेरे परिवार को भी ये सब झेलना पड़ेगा? मेरे साथ जाने वाली मेरी बहन को भी मेरी वजह से काफी कुछ सुनना और सहना पड़ता है। वो तलाक चाहते हैं, दूसरी शादी का इरादा है। मैं चैन से जी तो नहीं सकी पर चैन से मरना चाहती हूं, तलाक देने को तैयार हूं। कह भी चुकीं हूं उनसे, लेकिन वो तलाक के लिये भी पैसे चाहते हैं। जो सामान शादी में उपहार के तौर पर दिया गया उसको तो वापिस करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। मैं कब तक मां की पेंशन और भाई की खैरात पर पलती रहूं, सर।
क्या मैं दिल्ली या गाज़ियाबाद में घरेलू हिंसा, दहेज या मेंटेनेंस का कोई मामला नहीं कर सकती?
मेरा भाई यहां आसानी से मदद कर सकता है।
उत्तर
अनिता जी, तीसरा खंबा में हम हर बार यह बता चुके हैं कि अदालतो की संख्या आवश्यकता की एक चौथाई से भी कम होने के कारण समय पर न्याय हो पाना असंभव जैसा हो चुका है। देरी होने पर न्याय का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। फिर भी जैसी भी अवस्था है आप को भीरुता त्याग कर परिस्थितियों का मुकाबला करना चाहिए। आप को यह भी कहा गया था कि आप का मुकदमा जहाँ चल रहा है वहाँ भी आप की मदद की जा सकती है। लेकिन आप की ओर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं मिली। मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ कि धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता का आवेदन और 498-ए वहीं चल सकता है जहाँ आप के पति रहते हैं अथवा जहाँ आप के पति ने आप के साथ निवास किया है। इस कारण से यह कार्यवाही दिल्ली में हो सकना संभव नहीं है। लेकिन आप घरेलू हिंसा का मामला जहाँ आप रहती हैं वहाँ चला सकती हैं। जो आप को अब तक कर देना चाहिए था। अब आप इसे तुरंत करें।
आप के पति का आवेदन मिथ्या है तो वह मिथ्या ही प्रमाणित होगा। आप को अपने वकील से कहना चाहिए कि मुकदमे में क्यों देरी हो रही है। यदि हर माह दो पेशियाँ होती हैं तो अब तक तो मामला निपट जाना चाहिए था। धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के मामले में अदालत अधिक से अधिक साथ रहने की डिक्री पारित कर सकती है। लेकिन आप को अपने पति के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता। यदि डिक्री के उपरांत भी आप पति के साथ न रहें तो अधिक से अधिक आप के पति डिक्री के एक वर्ष के उपरांत तलाक की अर्जी दाखिल कर सकते हैं। जहाँ तक डराने-धमकाने का प्रश्न है। जब भी ऐसी घटना हो तो आप निर्भीक हो कर अदालत को इन घटनाओं की सूचना लिखित में दें और संबंधित पुलिस थाने में रपट लिखाएँ। क्यों कि रपट लिखाने पर ही आगे कार्यवाही संभव है उस के बिना नहीं। साहस तो आप को करना होगा। आप के पति के नगर में सहायता चाहिए तो मुझे मेल करें। सहायता उपलब्ध कराने का हरसंभव प्रयत्न किया जाएगा।
अंत में फिर से मेरा कहना यही है कि साहस न छोड़ें, सचाई पर कायम रहें। अन्तिम विजय आप की ही होगी।
विगत आलेख में हमारे पाठक ????? जी ने पांच सवालों के उत्तर चाहे थे, शेष रहे चार सवाल ये हैं......
1. सर, जब लड़की वाले लड़के वालों पर मैंटीनेंस, घरेलू हिंसा, दहेज आदि के केस लगा देते हैं तो क्या लड़के वालों के पास बचाव में कोई ऐसा केस नहीं है जो वे लड़की वालों पर लगा सकें? 2. सर, मैं ने एक वकील से सलाह ली तो वे बोले कि कोई भी लड़की वालों की रजिस्ट्री मत लेना। सर, इस से क्या होगा? क्या यह मेरे पक्ष में होगा? और यदि यह सही है तो कब तक मैं ऐसा करूँ? 3. सर, क्या मैंटीनेंस के, घरेलू हिंसा के तथा दहेज केस में स्टे ले सकता हूँ? और कब तक? 5. सर, मेरी पत्नी तीन साल से अपने मायके में है तो क्या घरेलू हिंसा बनती है?
उत्तर
पत्नी पति और उस के परिजनों पर भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, दहेज का मुकदमा कर दे तो बचाव में क्या करें?
लगता है, श्री ????? बहुत ही डरे हुए हैं। या तो इन सज्जन ने खुद गलतियाँ की हैं और उन के कारण खुद भयभीत हैं या फिर ये लोगों के किस्से सुन कर डर गए हैं। इन के प्रश्नों से लगता है कि अभी तक कोई मुकदमा इन की पत्नी की ओर से नहीं हुआ है। तीन वर्ष से इन के साथ नहीं रह कर अपने पिता के साथ रह रही है। अब यदि पत्नी के साथ इन सज्जन ने उचित व्यवहार नहीं किया है और घरेलू हिंसा की है तो ये तीनों मुकदमे करना इन की पत्नी का वाजिब अधिकार है। फिर तो एक ही राह रहती है कि ये खुद किसी तरह पत्नी को मना कर अपने साथ रखें और झगड़ा समाप्त करें। यदि ये गलती स्वीकार कर लें और भविष्य में न करने का आश्वासन दें तो यह समस्या का घर में ही, अथवा संबंधियों या मित्रों की मध्यस्थता से समाधान हो सकता है। यदि इन की कोई त्रुटि नहीं है तो फिर दूसरा मार्ग है।
अब यदि इन की कोई गलती नहीं तो ये भयभीत क्यों हो रहे हैं? इन की पत्नी तीन साल से अधिक समय से इन के साथ नहीं रह रही है। यदि ये चाहते हैं कि अपने साथ रखें और यह विवाह कायम रहे तो किस का इंतजार कर रहे हैं? हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत अदालत में वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना की अर्जी पेश करें। यदि इस काम में इन्हों ने देरी की तो इन्हें उक्त तीनों मुसीबतों बचाना किसी के भी लिए आसान नहीं होगा। धारा- 9 की अर्जी लगा देने के उपरांत उक्त तीनों ही मुकदमे चला पाना इन की पत्नी के लिए आसान नहीं होगा। यदि पाठक श्री ????? जी की पत्नी के पास इन से अलग रहने का कोई वाजिब कारण हुआ तो फिर धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम की अर्जी नहीं चल पाएगी। यह भी हो सकता है कि श्री ????? जी और इन की पत्नी के बीच अब वैवाहिक संबंध की कोई अवस्था ही नहीं रह गई हो। वैसी स्थिति में बिना युक्तियुक्त कारण के तीन वर्ष से इन के साथ न रह कर अलग रहना या पिता के पास रहना एक ऐसा कारण है कि श्री ????? जी उस के आधार पर धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत सीधे विवाह विच्छेद (तलाक) की डिक्री प्राप्त करने के लिए अर्जी अदालत में पेश कर सकते हैं।
श्री ????? जी को जिस किसी वकील ने सलाह दी है कि कोई भी रजिस्ट्री मत लेना, बहुत ही गलत सलाह दी है। इस का लाभ कुछ भी नहीं है और नुकसान बहुत हैं। यदि पत्नी ने कोई नोटिस इन्हें दिया और इन्होंने डाक लेने से मना कर दिया तो अदालत यही मानेगी कि इन्हों ने जानबूझ कर नहीं लिया और इन्हें नोटिस की जानकारी थी। जब यह माना ही जाना है कि इन्हें नोटिस की जानकारी थी तो इन्हें रजिस्ट्री ले ही लेना चाहिए जिस से इन्हें यह जानकारी तो रहे कि इन के विरुद्ध क्या हो रहा है। यदि अदालत से कोई नोटिस आया और इन्हों ने नहीं लिया तो अदालत इन के विरुद्ध एक पक्षीय आदेश पारित कर सुनवाई करेगी और एक तरफा निर्णय पारित कर देगी। यह एक तरफा निर्णय इन के विरुद्ध ही होगा इन के पक्ष में होने की संभावना ही नहीं होगी। ऐसे में जो भी भरण-पोषण अदालत निर्धारित कर देगी इन्हें भुगतना पड़ेगा। मेरी राय में इन्हें ही नहीं किसी को भी किसी भी स्थिति में किसी भी रजिस्ट्री को नहीं लौटाना चाहिए। रजिस्ट्री में जो भी मुसीबत हो उस का पता तो लगेगा और उस का मुकाबला किया जा सकेगा। मैंटीनेंस के, घरेलू हिंसा के तथा दहेज केस में कोई भी स्टे आप को नहीं मिल सकता है।
श्री ????? जी का अंतिम प्रश्न है कि क्या तीन वर्ष से अधिक से पत्नी के मायके में रहने के कारण घरेलू हिंसा का मामला बनता है या नहीं। जी, घरेलू हिंसा का मामला तो बनाया जा सकता है लेकिन यह मामला कमजोर होगा और और इन्हें कोई अच्छा वकील मिल जाए तो ये उसे खारिज करा सकते हैं। 498-ए के अंतर्गत मामला नहीं बनेगा। यदि किसी तरह बना दिया गया तो वह अवधि बाधित होने के कारण खारिज कराया जा सकता है। लेकिन भरण-पोषण की अर्जी तो इन की पत्नी लगा सकती है और उस के पास इन से अलग रहने का युक्तियुक्त कारण रहा तो इन्हें उचित भरण-पोषण राशि देनी पड़ेगी। आखिर वह इन की पत्नी है। यदि तलाक भी हो जाए और तलाक के समय स्थाई भरण-पोषण राशि निर्धारित न हो तो तलाक के बाद भी धारा-125 भारतीय दंड संहिता में इन के विरुद्ध भरण-पोषण के लिए इन की तलाकशुदा पत्नी अर्जी पेश कर सकती है और अदालत उसे भरण-पोषण राशि दिला सकती है।
अंतिम बात यह कि श्री ????? जी को हर हालत में किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ लेनी पड़ेंगी। वकीलों में अच्छे से अच्छे और घटिया से घटिया वकील हैं। अपने वकील का चुनाव बहुत सोच समझ कर करें और किसी विश्वसनीय और सिद्ध हस्त वकील कर अपनी समस्याओं का समाधान करने की ओर शीघ्र आगे बढ़ें, अब एक दिन की देरी भी भारी पड़ सकती है।
विगत आलेख में हमारे पाठक ????? जी ने अपने सवाल का उत्तर मिलने पर कुछ और सवाल सामने रखे थे, पाठक जी की चिट्ठी इस तरह है ......
सर! आप ने मेरी समस्या को पढ़ा और उस का उत्तर भी दिया आप का तहे दिल से धन्यवाद करता हूँ। सर! मेरे कुछ सवाल हैं जिन का जवाब जानना चाहता हूँ। 1. सर, कोई केस एक्स-पार्टे कैसे और कब होता है? केस एक्स पार्टे होने पर क्या करना पड़ता है? 2. सर, जब लड़की वाले लड़के वालों पर मैंटीनेंस, घरेलू हिंसा, दहेज आदि के केस लगा देते हैं तो क्या लड़के वालों के पास बचाव में कोई ऐसा केस नहीं है जो वे लड़की वालों पर लगा सकें? 3. सर, मैं ने एक वकील से सलाह ली तो वे बोले कि कोई भी लड़की वालों की रजिस्ट्री मत लेना। सर, इस से क्या होगा? क्या यह मेरे पक्ष में होगा? और यदि यह सही है तो कब तक मैं ऐसा करूँ? 4. सर, क्या मैंटीनेंस के, घरेलू हिंसा के तथा दहेज केस में स्टे ले सकता हूँ? और कब तक? 5. सर, मेरी पत्नी तीन साल से अपने मायके में है तो क्या घरेलू हिंसा बनती है?
उत्तर
कोई भी मुकदमा एक्स-पार्टे (Ex-parte) एक पक्षीय कैसे होता है?
जब भी कोई व्यक्ति अदालत में अपराधिक मुकदमे से भिन्न कोई अन्य मुकदमा किसी के विरुद्ध करता है तो अदालत उन लोगों को जिन के विरुद्ध मुकदमा किया गया है, मुकदमे के दावे या प्रार्थना पत्र की प्रति के साथ सम्मन या नोटिस भेजती है, जिन में लिखा होता है कि "आप के विरुद्ध श्री ..... ने मुकदमा किया है, आप को स्वयं अदालत में निश्चित दिन उपस्थित हो कर या इस सम्मन/नोटिस मिलने के 30 दिनों के भीतर इस का जवाब पेश करें और अपने जवाब के समर्थन में दस्तावेज यदि पेश करना चाहें तो साथ में प्रस्तुत करें। अन्यथा आप की अनुपस्थिति में मुकदमा एक-तरफा निर्णीत कर दिया जाएगा।
अदालत से जब भी इस तरह का सम्मन या नोटिस किसी को मिले तो उसे अदालत के समक्ष अपना पक्ष स्वयं अथवा किसी वकील या विधिपूर्वक नियुक्त प्रतिनिधि के माध्यम से समय रहते प्रस्तुत करना चाहिए। यदि जिसे सम्मन या नोटिस प्राप्त हुआ है वह अदालत के समक्ष उपस्थित नहीं हो या उस के उपरांत किसी भी पेशी वह स्वयं अथवा उस का वकील या अधिकृत प्रतिनिधि उपस्थित नहीं हो तो अदालत यह आदेश दे सकती है कि जो व्यक्ति उपस्थित नहीं हुआ है उस के विरुद्ध एक पक्षीय (Ex-parte) सुनवाई की जाएगी। उसी पेशी पर या आगामी पेशियों पर केवल वादी या प्रार्थी पक्ष की साक्ष्य ले कर तथा सुनवाई करते हुए निर्णय पारित कर दिया जाता है।
जिस पक्ष के विरुद्ध एक पक्षीय सुनवाई किए जाने का आदेश हुआ है वह उचित समय के भीतर निश्चित तिथि पर अदालत के समक्ष अनुपस्थित रहने का युक्तियुक्त कारण बता कर आवेदन कर सकता है कि उस के विरुद्ध किया गया एक पक्षीय आदेश निरस्त किया जाए और उसे सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाए। यदि अदालत अनुपस्थिति के कारण को सही और युक्तियुक्त मानती है तो एक पक्षीय सुनवाई का आदेश निरस्त कर देती है और सुनवाई का अवसर प्राप्त हो जाता है। एक पक्षीय हो जाने के उपरांत भी यदि न्यायालय में मुकदमा चलता रहता है तो जिस पक्ष के विरुद्ध एक पक्षीय आदेश हो गया है वह सुनवाई के किसी भी स्तर पर मुकदमे की कार्यवाही में उपस्थित हो कर भाग ले सकता है। लेकिन मुकदमे की जो कार्यवाही उस की अनुपस्थिति में हो चुकी है उसे पुनः दोहराया नहीं जाएगा।
संभवतः हमारे पाठक ????? जी को किसी ने सलाह दी है कि यदि उन के विरुद्ध पत्नी तलाक का मुकदमा कर दे और आप भी उस से छुटकारा पाना चाहते हैं तो अदालत में न जाइए। अदालत आप के विरुद्ध एक पक्षीय मुकदमा चला कर तलाक मंजूर कर ही देगी और आप को भी मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन उन के लिए तभी लाभदायक हो सकता है जब कि पत्नी ने कोई स्थाई पुनर्भरण की राशि की मांग न की हो। यदि अदालत तलाक के साथ कोई स्थाई पुनर्भरण की राशि की डिक्री भी पारित कर दे तो तलाक तो हो जाएगा किन्तु स्थाई पुनर्भरण की राशि भी साथ ही देनी पड़ जाएगी। इस लिए किसी भी मुकदमे की एक पक्षीय सुनवाई होना और एकपक्षीय डिक्री पारित होना अच्छी बात नहीं है। अच्छा तो यह है कि किसी भी मुकदमे में हाजिर हों और दावा करने वाले की सही बातों का समर्थन करें और गलत बातों का प्रतिवाद करें। जिस से सही निर्णय हो सके। मसलन, तलाक की अर्जी का अदालत से नोटिस मिलने पर अदालत में जाएँ, यदि वे समझते हैं कि तलाक होना चाहिए तो अदालत को कहें कि तलाक की डिक्री पारित कर दें लेकिन स्थाई पुनर्भऱण न दिलाएँ या कम दिलाएँ जो उन की क्षमता में हो।
आज बस इतना ही। शेष सवालों का जवाब अगली कड़ी में......
तीसरा खंबा के सहयोगी ब्लाग अदालत के टूलबार के माध्यम से एक पाठक से हमें निम्न समस्या प्राप्त हुई थी....
सर! मेरी शादी मई 2004 में हुई थी। लेकिन पत्नी शादी के बाद से ही मायके में रहने लगी। मैं घर लाता हूँ तो दस दिन से अधिक नहीं रहती है। धमकी देती है कि जहर खा लेंगे, फाँसी लगा लेंगे, समाज में तमाशा करेंगे, दहेज केस में फंसा देंगे, पत्नी के घर वाले भी धमकी देते हैं और पैसे मांगते हैं। समाज के लोगों ने समझाने की कोशिश की लेकिन सब बेकार गया। सर पत्नी तीन साल से भी अधिक समय से मायके में ही रहती है। कई बार कोशिश भी की लेकिन आती नहीं है। घऱ वाले और पत्नी धमकी मारती है कि पैसे ला कर दो, नया घर बना कर दो। सर, मैं मानसिक रूप से परेशान हो गया हूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं है क्यों कि वे दस दिन से अधिका मेरा पास रही नहीं. सर, सुनने में आया है कि मेरी पत्नी ने मेरे ऊपर भऱण पोषण, घरेलू हिंसा और दहेज का केस लगाने वाली है। मेरे माता-पिता सीधे सादे हैं। सर, मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बचाव में क्या कर सकता हूँ। सर,कृपया जल्दी जवाब देने का कष्ट करें वरना एक बेकसूर घर और बरबाद हो जाएगा मेरे ई-मेल पर मुझे सलाह देने का कष्ट करें। - आप का ?????
हम ने उक्त सज्जन को जो उत्तर दिय़ा वह इस प्रकार है.....
????? जी!
आप की समस्या को कुछ तो आप ने बढ़ा लिया है। वास्तव में आप की पत्नी और ससुराल वाले आप को ब्लेक-मेल कर रहे हैं। वे जानते हैं कि ऐसा किया जा सकता है। सब से पहले तो आप उन की किसी भी बात का उत्तर देना और प्रतिक्रिया करना बंद कर दें। उन्हें लगे कि आप उन की परवाह नहीं करते हैं। पत्नी को लाने के बारे में सोचना और कुछ भी करना बंद कर दें। आप ने यह नहीं बताया कि आप किस प्रांत से हैं। यदि आप के प्रांत में पुलिस द्वारा स्थापित परिवार परामर्श केन्द्र हो तो वहाँ अपनी सारी कहानी लिखते हुए एक शिकायत करिए। पुलिस आप की पत्नी और ससुर को बुला कर कार्यवाही करेगी जिस का विवरण भी रखेगी। कभी आप की पत्नी ने आप पर मुकदमा किया तो आप को उस से मदद मिलेगी। जिस तरह से आप की पत्नी और ससुर आप को ब्लेकमेल कर रहे हैं उस की शिकायत भी पुलिस को कीजिए। आप की पत्नी तीन साल से अधिक समय से आप के संपर्क में नहीं है और उस के पिता के यहाँ रह रही है इस कारण से 498-ए का मामला नहीं बनता है। यदि आप के विरुद्ध कोई मुकदमा या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जाए तो उसे खारिज कराने के लिए आप को हाईकोर्ट में सीधे कार्यवाही करनी चाहिए। यदि आप के विरुद्ध मुकदमा हो ही जाए तो आप को किसी समझदार वकील की सहायता लेनी ही पड़ेगी। आप चाहें तो अभी किसी वकील से मिल कर धारा-9 हिन्दूविवाह अधिनियम के तहत पत्नी से वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना का दावा करें। यदि दावे में आदेश हो जाने पर भी वह नहीं आती है तो आप तलाक ले सकते हैं। या फिर सीधे ही इस आधार पर कि आप की पत्नी ने तीन साल से अधिक समय से आप का परित्याग कर रखा है, तलाक की अर्जी दाखिल करवा सकते हैं। पर आप को अपनी समस्या ले कर पुलिस और अदालत के पास तो जाना ही होगा।
उक्त उत्तर मिलने पर पाठक ने हमें समस्या पढ़ने और उत्तर देने के लिए शुक्रिया किया और कहा कि .....
सर! कुछ सवाल और हैं जिन के जवाब जानना चाहता हूँ।
अब आप भी अवश्य जानना चाहेंगे कि श्री ????? जी के वे सवाल क्या हैं? और हम उन के उत्तर क्या देते हैं। लेकिन इस के लिए आप को तीसरा खंबा के अगले अंक की प्रतीक्षा करनी होगी। यह अंक पढ़ने के लिए धन्यवाद। आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य अंकित करें।
राजस्थान का बजट आ चुका है। उस की आलोचना भी हो रही है और तारीफ भी। तीसरा खंबा ने अर्जुन की आंख की तरह केवल यह तलाशना आरंभ किया कि न्याय व्यवस्था के लिए इस में क्या है? इस ने मुझे बहुत निराश किया। यह बजट राज्य के न्यायार्थियों के लिए बहुत ही निराशाजनक है।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश ने पिछले दिनों राज्यसरकारों से अपील की थी कि उन्हें देश में तुरंत दस हजार (10000) अधीनस्थ न्यायालय चाहिए वरना देश की न्याय व्यवस्था को बचा पाना असंभव हो जाएगा। इस अपील के बाद यह आशा की जाती थी कि राज्य सरकार राजस्थान में कम से कम 100 नयी अदालतें स्थापित करने के लिए बजट में प्रावधान करेगी। लेकिन जब बजट सामने आया तो उस से पूरी तरह निराशा हुई है कि राज्य सरकार प्रदेश को न्याय दिलाने के मामले में पूरी तरह उदासीन है।
आज राजस्थान में हालात यह हैं कि मजिस्ट्रेट स्तर की अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक फौजदारी मामले केवल धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के ही हैं। अधिकांश अदालतों में दो हजार से चार हजार या उस से भी अधिक मुकदमे लम्बित हैं। प्रत्येक अदालत के पास फौजदारी के साथ ही दीवानी मुकदमे भी होते हैं। मुकदमों के इस अम्बार को निपटाने के लिए तुरंत अदालतों की संख्या को दुगना किया जाना आवश्यक है। दीवानी मुकदमे जो दो वर्ष में एक अदालत से निर्णीत हो जाने चाहिए, वे बीस-बीस वर्ष ले रहे हैं। जो पीढ़ी मुकदमा लगाती है निर्णय उस से अगली पीढ़ी ही देख पाती है। फौजदारी मुकदमों में देरी के कारण अपराधियों को सजा नहीं हो पाती और समाज में अपराध दर लगातार बढ़ रही है। यदि नई अदालतें नहीं खुलती हैं तो उस का परिणाम समाज के लिए यह होगा कि लोग अपने विवादों को सड़कों पर बाहुबल से निपटाने लगेंगे और समाज अराजकता की ओर बढ़ेगा।
न्यायालयों में मुकदमों में निर्णय न होने से मुवक्किलों और वकीलों के बीच तथा वकीलों और जजों के बीच असंतोष सीमा के बाहर होता जा रहा है। हाल ही में दिल्ली में एक जज के साथ हुई घटना के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है। अब वह समय है कि नयी अदालतों की स्थापना के लिए जनता राज्य सरकार और केंद्र सरकार के विरुद्ध संघर्ष के मैदान में उतरे। इस विषय पर वकीलों और उन के संगठनों को भी तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। इस विषय को वे ही गंभीरता से समझ सकते हैं और जनता का नेतृत्व कर सकते हैं।
कृपया मुझे सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 8 (1) के (घ) और (ङ) को सामान्य भाषा में बताने का कष्ट करेंगे(व्याख्या)? मैंने इस कानून के तहत स्थानीय बी एस एन एल कार्यालय से कुछ जानकारीयाँ प्राप्त करना चाहा परंतु उपरोक्त कंडिकाओं का सहारा लेकर जानकारी देने से इंकार किया जा रहा है।
उत्तर.....
मृत्युञ्जय जी,
आप ने सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 के बारे में पूछा है। इस कानून की इस धारा के अंतर्गत यह कहा गया कि मांगे जाने पर किन बातों की सूचना देने की बाध्यता नहीं होगी। धारा 8 (1) के अंतर्गत कंडिका (घ) और (ङ) निम्न प्रकार हैं-
(घ) सूचना जिस में वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता, या बौद्धिक संपदा सम्मिलित है।, जिस के प्रकटन से किसी तृतीय पक्ष की प्रतियोगी स्थिति का को नुकसान होता है, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी को यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी सूचना के प्रकटन से विस्तृत लोकहित का समर्थन होता है।
(ङ) किसी व्यक्ति को उस की वैश्वासिक नातेदारी में उपलब्ध सूचना, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी सूचना के प्रकटन से विस्तृत लोक हित का समर्थन होता है
आप ने बीएसएनएल से सूचनाएँ चाही हैं जो कि एक व्यापारिक संस्थान है और अनेक अन्य व्यापारिक संस्थानों के साथ अनुबंध रखता है जो कि उसी प्रकार के व्यवसाय में हैं जिस में बीएसएनएल भी है। यदि आप के द्वारा चाही गई सूचनाओं में (वाणिज्यिक विश्वास) उदाहरणार्थ कोई ऐसी सूचना जो दो व्यापारियों के बीच है और ग्राहकों तक नहीं पहुँचनी चाहिए, कोई व्यापारिक गोपनीयता या बौद्धिक संपदा सम्मिलित है उस सूचना के देने से बीएसएनएल और आप के अतिरिक्त किसी भी तीसरे पक्ष की व्यापार में प्रतियोगी स्थिति को नुकसान पहुँचता है तो ऐसी सूचना आप को नहीं दी जा सकती है।
इसी तरह यदि कोई सूचना किसी को विश्वासिक नातेदारी के माध्यम से प्राप्त हुई है, अर्थात काम के सामान्य व्यवहार के अलावा किसी मित्र, संबंधी या मालिक नौकर जैसे संबंधों के माध्यम से प्राप्त हुई हो तो ऐसी सूचना भी आप को नहीं दी जा सकती।
इस तरह की सूचनाएँ तभी दी जा सकती है जब कि यह समाधान हो जाए कि यह आम जनता या आम ग्राहकों के हित में है। सूचना प्राप्त करने के लिए आप को यह बताना पड़ेगा कि मांगी गई सूचना में कोई वाणिज्यिक विश्वास, व्यापार गोपनीयता, या बौद्धिक संपदा सम्मिलित नहीं है अथवा वह वैश्वासिक नातेदारी के माध्यम से प्राप्त होने के स्थान पर व्यवहार के सामान्य क्रम में प्राप्त हुई है।
आप के द्वारा चाही गई सूचनाएँ यदि उक्त कोटि की हैं तो भी आप उन्हें प्राप्त कर सकते हैं लेकिन आप को यह बताना होगा कि मांगी गई सूचना लोक हित में आवश्यक है। यदि दोनों में से कोई एक या दोनों बातें आप के पक्ष में हैं तो आप सूचना अधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपनी शिकायत आगे दर्ज करवा सकते हैं।
मैं ने एक दुकान एक डेंटिस्ट को सोलह वर्ष पूर्व किराए पर दे रखी है। यह डेंटिस्ट फर्जी है। मुझे अपने भतीजे को वहाँ नया धंधा कराने के लिए चाहिए। कृपया मुझे उचित सलाह दीजिए।
उत्तर......
हरीश जी!
जिस किसी को भी आप ने दुकान दी है। वह जीवन में कभी भी दुकान का मालिक नहीं हो सकता। वह हमेशा ही किराएदार रहता है। प्रत्येक राज्य में किराएदार से परिसर चाहे वह आवासीय हो या व्यावसायिक कुछ विशेष आधारों पर खाली कराए जा सकते हैं। आप के प्रश्न से स्पष्ट है कि आप के पास दो मजबूत आधार उपलब्ध हैं जिन के कारण आप अपने डेंटिस्ट किराएदार से दुकान खाली करा सकते हैं। पहला आधार तो यह है कि आप को उस व्यावसायिक परिसर की आप के भतीजे के धंधे के लिए सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता है। दूसरा आधार यह है कि आप का किराएदार आप से किराए पर लिए गए परिसर में अवैधानिक गतिविधियाँ चला रहा है।
आप को इस के लिए जहाँ परिसर स्थित है, वहाँ का क्षेत्राधिकार रखने वाली दीवानी अदालत या किराया अधिकरण जो भी हो वहाँ एक वाद या अर्जी दाखिल करनी होगी। इस काम को कोई दीवानी का सिद्ध-हस्त वकील कर सकता है। इस के लिए उसी अदालत में पैरवी करने वाले किसी समझदार और वरिष्ठ वकील से मिल कर अपनी समस्या बताएँ। वह आप की समस्या का हल आप को बता देगा। यदि आप को लगे कि वह उचित उपाय बता रहा है तो उसे अपना मुकदमा लड़ने के लिए वकील कर लें। हाँ वकील चुनने का काम पूरी सावधानी से करें। उस के बारे में यह जानकारी कर लें कि वह आप का काम कराने के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं।
आप दीवानी कार्यवाही के अतिरिक्त एक काम और कर सकते हैं। यदि आप का किराएदार डेंटिस्ट फर्जी है तो आप उस की शिकायत पुलिस से कर सकते हैं। इस से पुलिस उस के विरुद्ध कार्यवाही करेगी और उस का धंधा बन्द हो जाएगा। इस से आप को उस से अपना परिसर खाली कराने में मदद मिलेगी। यह कोई गलत काम नहीं है क्यों कि कोई भी व्यक्ति जो अवैधानिक काम कर रहा है उस की सूचना पुलिस को देना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।
इस श्रंखला की आठवीं कड़ी में भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध के रूप में परिभाषित वाक् प्रस्तुतियों और अभिव्यक्तियों पर चर्चा की थी। ये सभी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर निर्बंधन के रूप में प्रभावी हैं। इस कानून के अंतर्गत वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को सर्वाधिक प्रभावित करे वाले निर्बंधन किसी की मानहानि करने तथा अपमान से संबंधित हैं।
भारतीय दंड संहिता की धारा 499 में मानहानि को इस तरह परिभाषित किया गया है-
जो कोई बोले गए, या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्य निरूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाएया यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी अपवादों को छोड़ कर यह कहा जाएगा कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है।
यहाँ मृत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आता है, यदि वह लांछन उस व्यक्ति के जीवित रहने पर उस की ख्याति की अपहानि होती और उस के परिवार या अन्य निकट संबंधियों की भावनाओं को चोट पहुँचाने के लिए आशयित हो। किसी कंपनी, या संगठन या व्यक्तियों के समूह के बारे में भी यही बात लागू होगी। व्यंगोक्ति के रूप में की गई अभिव्यक्ति भी इस श्रेणी में आएगी। इसी तरह मानहानिकारक अभिव्यक्ति को मुद्रित करना, या विक्रय करना भी अपराध है।
लेकिन किसी सत्य बात का लांछन लगाना, लोक सेवकों के आचरण या शील के विषय में सद्भावनापूर्वक राय अभिव्यक्ति करना तथा किसी लोक प्रश्न के विषय में किसी व्यक्ति के आचरण या शील के विषय में सद्भावना पूर्वक राय अभिव्यक्त करना तथा न्यायालय की कार्यवाहियों की रिपोर्टिंग भी इस अपराध के अंतर्गत नहीं आएँगी। इसी तरह किसी लोककृति के गुणावगुण पर अभिव्यक्त की गई राय जिसे लोक निर्णय के लिए ऱखा गया हो अपराध नहीं मानी जाएगी।
मानहानि के इन अपराधों के लिए धारा 500,501 व 502 में दो वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। लोक शांति को भंग कराने को उकसाने के आशय से किसी को साशय अपमानित करने के लिए इतनी ही सजा का प्रावधान धारा 504 में किया गया है।
धारा 505 में किसी भी ऐसे कथन, जनश्रुतिया रिपोर्ट को इस आशय से प्रकाशित करना जिस से तीनों सेनाओं का कोई अफसर या सैनिक विद्रोह करे या अपने कर्तव्य की अवहेलना करे, या जनता या उस के किसी भाग को भय या संत्रास हो और जिस से कोई व्यक्ति राज्य या लोक शांति के विरुद्ध अपराध करने को उत्प्रेरित हो या जिस से व्यक्तियों का कोई वर्ग या समुदाय किसी दूसरे वर्ग या समुदाय के विरुद्ध अपराध करने को उत्प्रेरित हो अपराध घोषित कर तीन वर्ष तक की कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। विभिन्न वर्गों में शत्रुता, घृणा या वैमनस्य पैदा करने की भावनाएं धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवास स्थान, भाषा, जाति या समुदाय के आधारों पर पैदा करने और फैलाने वाली अभिव्यक्तियों के प्रकाशन और वितरण करने को भी अपराध घोषित कर इतनी ही सजा का प्रावधान किया गया है। लेकिन किसी बात के सत्य होने का युक्तियुक्त आधार होने पर उसे सद्भावनापूर्वक प्रकाशित करने या वितरित करना अपराध नहीं है।
उक्त सभी अभिव्यक्तियों को अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है जो कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर निर्बंधन हैं।
इस श्रंखला की अगली कड़ी में ब्लागिंग पर इन निर्बंधनों के प्रभाव की बात करेंगे।(क्रमशः जारी)Read more...
इधर यहाँ वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर श्रंखला चल रही है। इस बीच संजय बैंगाणी जी के जोग लिखी पर का एक आलेख भारत, संस्कृति और समलैंगिकता पढ़ने को मिला। मैं ने टिप्पणी कर उन के बहाव की विपरीत दिशा में तैरने के साहस को सलाम करने के साथ उन के विचार से सहमति जाहिर की और धारा 377 को दंड संहिता से हटाए जाने के खतरों के बारे में भी बताया। इस विषय पर उन से कुछ विमर्श भी हुआ। इस बीच कल सुबह दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय आ गया। इस निर्णय ने धारा 377 के मामले में जो धुंध थी उसे छाँट दिया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को हटाने के मामले में पिछले दिनों विधि मंत्रालय से खबर आई तो अचानक मीडिया और प्रेस को चर्चा के लिए फिर से यह विषय मिल गया था। इस पर राजनीति भी आरंभ हो गई थी। पर कुछ विषय हैं जिन पर राजनैतिक और वैयक्तिक समझ के दुराग्रहों को छोड़ कर विचार करना सदैव बेहतर होता है। यह भी एक ऐसा ही विषय था जिस पर इसी तरह विचार कर सकते थे। अब दिल्ली उच्चन्यायालय के निर्णय की प्रतिक्रिया में जहाँ कुछ के दिल बल्लियों उछल रहे हैं वहीं विपरीत प्रतिक्रियाएँ भी कम नहीं हैं। किसी को समाज की चिन्ता सता रही है तो कुछ इसे सुधार का कदम भी मान कर चल रहे हैं। आलोचक इसे समलैंगिक स्वतंत्रता के रूप में देख हैं और माध्यमों ने भी इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया है। धार्मिक नेता इसे अपना अपमान समझ बैठे हैं इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा कर बैठे हैं। वहीं कुछ राजनेताओं को इस में कुछ वोट कबाड़ने की जुगत भी दिखाई देती है। लेकिन सोच सही नहीं है कि यह निर्णय समलैंगिक स्वतंत्रता प्रदान करता है।
समलैंगिकता पर विज्ञान ने शोध उपरांत जो मत रखे हैं उन में प्रधान मत है कि इस प्रवृत्ति का कारण किसी व्यक्ति की शारीरिक बनावट है, जिस का निर्धारण मनुष्य के हाथ में नहीं है। इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगा पाना भी उस व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं जिसे इस प्रवृत्ति के लिए दोषी मान लिया गया है। यह सही है कि मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति में यह एक विचलन है और यह जितना कम हो उतना ही अच्छा है। लेकिन इस का अर्थ यह तो नहीं कि किसी को जन्मजात अथवा इसी समाज द्वारा आरंभिक लालन-पालन के बीच दी गई शारीरिक विकृति की सजा दी जाए। ऐसा हो रहा था कि कुछ व्यक्तियों को उस दोष के लिए सजा दी जा रही थी जो उन का न हो कर प्रकृति का अथवा समाज का था।
दिल्ली उच्च-न्यायालय का निर्णय 105 पृष्ठों का है जिस में 26397 शब्द हैं। इसे पढ़ने में समय लगेगा। लेकिन न्यायालय ने तमाम संभावनाओं, सामाजिक परिस्थतियों, तथ्यों, विचारों और दुनिया भर के निर्णयों पर भरपूर विचार करने के उपरांत जो निर्णय दिया है, उस का अन्तिम चरण इस प्रकार है-
We declare that Section 377 IPC, insofar it criminalisesconsensual sexual acts of adults in private, is violative ofArticles 21, 14 and 15 of the Constitution. The provisions ofSection 377 IPC will continue to govern non-consensualpenile non-vaginal sex and penile non-vaginal sex involvingminors. By 'adult' we mean everyone who is 18 years of ageand above. A person below 18 would be presumed not to beable to consent to a sexual act. This clarification will hold till,of course, Parliament chooses to amend the law toeffectuate the recommendation of the Law Commission ofIndia in its 172nd Report which we believe removes a greatdeal of confusion. Secondly, we clarify that our judgmentwill not result in the re-opening of criminal cases involvingSection 377 IPC that have already attained finality.We allow the writ petition in the above terms.
न्यायालय ने धारा 377 में से केवल निजता में वयस्कों दारा सहमति से किए गए यौनाचरण को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के कानून के समक्ष समता और संरक्षण के मूल अधिकार, अनुच्छेद 15 में लिंग के आधार पर विभेद के मूल अधिकार और अनुच्छेद 21 में प्रदत्त प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण के अधिकार के विरुद्ध मानते हुए इसे दंडनीय श्रेणी से बाहर किया है। मेरी समझ में इस से समाज को कोई हानि नहीं होने वाली है। इस से सरकार को धारा 377 भारतीय दंड संहिता को इस निर्णय के प्रकाश में संशोधित करने लिए एक दिशा मिली है। इस से धारा 377 में केवल यह अपवाद जोड़ना ही पर्याप्त होगा कि, "निजता में वयस्कों द्वारा सहमति से किया गया यौनाचरण इस धारा के अंतर्गत दंडनीय नहीं होगा"
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के होते हुए भी जितने भी कानून कानून की किताबों में मौजूद हैं और जो भारत में प्रभावी हैं वे यदि इस अधिकार पर कोई निर्बंधन लगाते हैं तो वे सभी निर्बंधन तब तक लागू हैं जब तक कि उन्हें किसी न्यायालय द्वारा संविधान सम्मत नहीं मानते हुए निरस्त (ultra-virus) घोषित नहीं कर दिया जाता है। बहुत सी वाक् प्रस्तुतियों और अभिव्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। ये सभी निर्बंधन के रूप में प्रभावी हैं।
दुष्प्रेऱण- भारतीय दंड संहिता का अध्याय-5 दुष्प्रेरण के विषय में हैं। इस में यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को किसी बात को करने के लिए उकसाता है तो वह दुष्प्रेरण करता है जो कि एक अपराध है। दुष्प्रेरण का कोई भी कृत्य यदि कोई व्यक्ति वाक् अथवा किसी अभिव्यक्ति के माध्यम से करता है तो वह अपने इस कृत्य के लिए उक्त स्वतंत्रता के मूल अधिकार का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता। चूंकि यह दुष्प्रेरण एक अपराध है इस कारण से दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी अपराध है। उदाहरणार्थ मैं अपने आलेख में किसी अन्य लेखक को कोई खास प्रकार का आलेख लिखने के लिए प्रेरित करता हूँ और ऐसा आलेख लिखे जाने पर वह किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है तो यह समझा जाएगा कि मैं ने भी दुष्र्पेरण का अपराध किया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 121 में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध का दुष्प्रेरण एक गंभीर अपराध है। इसी प्रकार तीनों सेनाओं के सैनिक को विद्रोह के लिए उकसाने को अपराध घोषित किया गया है और इस उकसाने पर वाकई कोई विद्रोह होता है तो ऐसे उकसाने को और गंभीर अपराध घोषित किया गया है। दि कोई इस प्रकार की अभिव्यक्ति करे जो कि भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध अथवा किसी सैनिक को विद्रोह के लिए उकसाती है तो यह अपराध होगा और इस के लिए कोई नागरिक मूल अधिकार की संरक्षा प्राप्त नहीं कर सकता।
भारतीय दंड संहिता की धारा 153क में प्रावधान है कि राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन और प्राख्यान भी गंभीर दंड हैं। धारा 292,293 तथा 294 अश्लील पुस्तकों और वस्तुओं आदि के विक्रय के संबंध में तथा अश्लील गानों के संबंध में अपराधों को परिभाषित करती हैं। धारा-295-क विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कार्यों को जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान कर के उस की धार्मिक भावनाओं को आहत करे के आशय से किए गए हों अपराध घोषित करता है। धारा 298 धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के विमर्शित आशय से शब्द उच्चारित करने को अपराध परिभाषित करती है।
यदि कोई नागरिक इन परिभाषित अपराधों में वर्णित कोई कृत्य या अकृत्य करता है तो उस का यह कृत्य उक्त स्वतंत्रता के मूल अधिकार से परे होगा और उसे मूल अधिकार के आधार पर कोई संरक्षा प्राप्त नहीं होगी।
इस श्रंखला में हमने वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार और उस के विभिन्न रूपों के बारे में जाना। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने की व्यवस्था की है। यह अनुच्छेद इस प्रकार है ...
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उस के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने में राज्य को निवारित नहीं करेगी।
इस तरह यह अनुच्छेद जिन आधारों पर नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने के लिए कानून बनाने के लिए और वर्तमान कानूनों का प्रवर्तन कराने का अधिकार राज्य को प्रदान करती है वे इस तरह होंगे-
भारत की प्रभुता व अखंडता के हित में;
राज्य की सुरक्षा के हित में;
विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में;
लोक व्यवस्था बनाए रखने के हित में;
शिष्टाचार या सदाचार के हित में;
न्यायालय-अवमानके संबंध में;
मानहानि के संबंध में तथा
अपराध-उद्दीपन के संबंध में।
उक्त मामलों में यदि विधायिका किसी कानून का निर्माण करती है तो न्यायालय उस कानून के द्वारा लगाए गए निर्बंधनों को केवल इस आधार पर निरस्त नहीं कर सकती है कि वे नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं। लेकिन वे इस तथ्य पर विचार कर सकते हैं कि जो निर्बंधन लगाए गए हैं वे युक्तियुक्त हैं या नहीं हैं। युक्तियुक्तता की जाँच करने के संबंध में न्यायालय की शक्तियाँ असीमित हैं। इस पर विचार करते हुए न्यायालय का मानक यह रहेगा कि क्या एक सामान्य व्यक्ति इन निर्बंधनों को युक्तियुक्त मानता है या नहीं। न्यायालय यह विचार कर सकता है कि जो निर्बंधन लगाए गए हैं क्या उस से कम निर्बंधनों को लगाने से भी उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है? निर्बंधनों को उस बुराई के अनुपात में होना चाहिए जिसे रोकने के लिए उसे लगाया जा रहा है। निर्बंधन की युक्तियुक्तता पर विचार के लिए न्यायालय कानून के उद्देश्य, देश की तत्कालीन परिस्थितियों, और निर्बंधन की प्रकृति, तात्कालिकता और उस की समय सीमा पर विचार कर सकता है। कानून द्वारा वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जा रहे निर्बंधन से अति नहीं होना चाहिए और उसे मनमाना भी नहीं होना चाहिए, वह ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि मूल अधिकार को ही ध्वस्त कर दे। निर्बंधन को अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होना चाहिए। निर्बंधन को सदैव ही न्यायिक पुनरीक्षण के लिए उपलब्ध होना चाहिए।
वर्तमान कानूनों के अंतर्गत बहुत से निर्बंधन नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर लगे हुए हैं। जिन में से बहुतों को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में रखा हुआ है। इन निर्बंधनों का उल्लंघन किए जाने पर किसी को भी अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है और यह सिद्ध हो जाने पर कि कोई व्यक्ति उन निर्बंधनों में से किसी एक या एकाधिक के उलंघन का दोषी है तो कानून के अनुसार उसे दंडित किया जा सकता है।
आगे हम कुछ प्रमुख निर्बंधनों के संबंध में जानेंगे।(क्रमशः जारी)