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Tuesday 30 June 2009

अन्तर्जाल और ब्लागिंग : वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार (6)

अंतर्जाल ने  सूचनाओं के आदान प्रदान की गति को तेज किया, तो इस सुविधा से युक्त लोगों को एक वैश्विक मंच भी प्रदान किया है। आज ई-मेल के माध्यम से तुरंत सूचनाएँ दुनिया के किसी भी कोने से दूसरे कोने तक पहुँचती हैं।  आप पानी का एक गिलास पिएँ इस के पहले उस का उत्तर मिल जाता है।  इस माध्यम पर धीरे धीरे महत्वपूर्ण सूचनाएँ एकत्र होने लगीं।  उन्हें तलाशने के लिए खोज यंत्र बने।  आज किसी भी सूचना को प्राप्त करने के लिए सब से पहले अन्तर्जाल को खोजा जाने लगा है। सामाजिक समूह बने और फिर ब्लागिंग होने लगी। ब्लागिंग के माध्यम से हर मिनट नई सूचनाएँ जाल पर आने लगीं। गूगल, वर्डप्रेस और अन्य अनेक संस्थाओं ने अंतर्जाल पर लोगों को ब्लागिंग के लिए स्थान और साधन निशुल्क उपलब्ध कराना आरंभ कर दिया।  इस से जिन लोगों को इस साधन की उपलब्धता है, वे अपने अपने ब्लाग के माध्यम से नई सूचनाएँ और विचार अंतर्जाल पर डालने लगे।  इन मंचों ने अंतर्जाल की सुविधाओं को आम लोगों में लोकप्रियता प्रदान की है।

आज दुनिया की सभी समृद्ध भाषाओं में ब्लागिंग हो रही है, जहाँ वाक् और अभिव्यक्ति की हर  कला और विधा को स्थान मिला है।  संगीत, चित्र, चलचित्र, पेंटिंग्स, गद्य और पद्य लेखन, समाचार, आलेख सब कुछ ब्लागिंग में मौजूद है।  वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार को जो ऊंचाई ब्लागिंग ने प्रदान की है वह आज तक के इतिहास में उपलब्ध नहीं हो सकी थी।  कोई भी व्यक्ति अब अपने विचारों को किसी भी रूप में ब्लागिंग के माध्यम से अभिव्यक्त कर सकता है।  इस के लिए मनुष्य जाति को इस नई तकनीक का आभारी होना चाहिए। 
पु्स्तकों को ज्ञान का वाहक माना जाता है।  लेकिन इस का अर्थ यह नहीं कि वे केवल ज्ञान का प्रकाश ही फैलाती हैं। बहुत बड़ी मात्रा में पुस्तकें अज्ञान की वाहक भी हैं।  उसी तरह अभिव्यक्ति का हर माध्यम ज्ञान के साथ साथ अज्ञान भी फैलाता है।   अज्ञान फैलाने वाली पुस्तकें रोज बड़ी मात्रा में प्रकाशित हो कर फुटपाथ पर बिकती हैं, लेकिन उन में शायद ही कोई स्थाई स्थान प्राप्त कर पाती हों। वे जुगनू की तरह चमकती हैं और फिर अपना प्रकाश खो देती हैं।  लेकिन ज्ञानवाहक पुस्तकें एक बार चमकना आरंभ करती हैं तो फिर उन की वह चमक तब तक बरकरार रहती है जब तक कि उस से अधिक प्रकाशवान कोई अन्य न आ जाए।  उस के उपरांत भी वे इतिहास में अदा की गई अपनी भू्मिका के रूप में मौजूद रहती हैं।  अनेक बार आवश्यकता होने पर उन्हें तलाश करने में मनुष्य को अथक श्रम करना पड़ा है।  इसी तरह ज्ञान की वाहक सूचनाओं और अभिव्यक्तियों की स्थिति ब्लाग जगत में भी रहेगी।
अंततः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।  आरंभ में वह अत्यन्त छोटे-छोटे समूहों में रहता था।  जैसे जैसे तकनीक का विकास हुआ उस का यह समूह बढ़ता गया। आज के राष्ट्र वैसे ही सब से बड़े समूह हैं।  तकनीक इन समूहों को भी तोड़ रही है और एक विश्व समुदाय का निर्माण कर रही है।  मनुष्य का विश्व समुदाय भविष्य की वास्तविकता है।  उस की ओर से किसी भी स्थिति में आँखें बन्द नहीं की जा सकती हैं।  मनुष्य का इतिहास ही छोटे समूहों से वसुधैव कुटुम्बकम की ओर की यात्रा है।  अंतर्जाल और ब्लागिंग ने इस यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए संवाद का मंच जुटा दिया है।  
जब मनुष्य एक विश्व समुदाय के निर्माण की ओर बढ़ रहा है तो उसे और अधिक सामाजिक होना पड़ेगा।  उसे उन मूल्यों की परवाह करनी पड़ेगी जो इस विश्व समुदाय के बनने और उस के स्थाई रूप से बने रहने के लिए आवश्यक हैं।  वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इन मूल्यों के परे नहीं हो सकती। हमें इन मूल्यों की परवाह करनी होगी।  संविधान ने इन मूल्यों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 19 (2) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने की व्यवस्था की है।  ब्लागिंग सहित संपूर्ण अंतर्जाल पर वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी इन निर्बंधनों के अधीन हैं। 
संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के ये निर्बंधन क्या हैं? इस पर हम अगले आलेख में बात करेंगे। (क्रमशः जारी)




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Sunday 28 June 2009

ब्लॉगिंग या चिट्ठाकारी : स्वतंत्रता का मूल अधिकार (5)

हम ने पिछले आलेखों में जाना कि प्रेस की स्वतंत्रता भी वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत ही एक अधिकार है। समाचार पत्र और अन्य माध्यमों का आज लवाजमा इतना भारी हो चुका है कि उस में बहुत बड़ी पूँजी का निवेश किए बिना उन्हें चला पाना संभव नहीं रहा है।  अधिकतर बड़े और मध्यम समाचार पत्र और माध्यम या तो सरकारी हैं अथवा उन पर किसी न किसी वाणिज्यिक घराने की पूँजी लगी है और वे दोनों ही अपने प्रायोजकों के प्रति अपनी वफादारी का पूरा सबूत देते हैं।  कुछ माध्यम और समाचार पत्र व्यावसायिक गतिविधि के रूप में ही चलते हैं उन पर विज्ञापन दाताओं का भारी प्रभाव रहता है।  इस कारण से उन्हें स्वतंत्र अभिव्यक्ति माध्यम कहने से स्वतंत्रता शब्द ही अपमानित हो जाएगा।  मध्यम और छोटे समाचार पत्र जिन्हें खुद पत्रकार लोग निकालते हैं वे भी सरकारी और गैर सरकारी विज्ञापनों की आस और जुगाड़ में निष्पक्ष नहीं रह पाते। बहुत छोटे अनेक समाचार पत्र पीत पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं और उस के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। 

कुछ दिनों पहले एक ऐसा व्यक्ति गवाह के रूप में मेरे सामने आया जो अपने आप को पत्रकार और प्रेस का मालिक कहता था। वह अपनी आमदनी पचास हजार प्रतिमाह बता रहा था। जिस में से तकरीबन चालीस हजार की आमदनी उसने केवल समाचार पत्र से होना बताई थी।  वह मोटर एक्सीडेण्ट के एक मुकदमे में घायल दावेदार की ओर से घायल की आमदनी को प्रमाणित करने के लिए आया था और कह रहा था कि घायल उस के यहाँ वाहन चालक था और छह हजार रुपए प्रतिमाह उस का वेतन देता था। इस बात का एक प्रमाण पत्र भी उस ने जारी किया था।  मैं ने उस के अखबार को कभी देखा न था।  खैर उस से जिरह के बाद आमदनी तो वह साबित नहीं कर सका लेकिन बाद में मैं ने उस से उस का अखबार मुझे दिखाने को कहा तो उस ने 12 पृष्ठों का ग्लेज्ड पेपर पर छपा एक रंगीन अखबार उसने मुझे बताया।  जिस में अधिकांश समाचार इस तरह के थे जैसे उन के माध्यम से किसी को ब्लेक मेल किया जा रहा हो।  ऑफ द रिकॉर्ड उस ने बताया कि असली आमदनी ही आज अखबार की उन सरकारी अफसरों को ब्लेक मेल के जरिए होती है जो सरकार और जनता को हर माह करोड़ों का चूना लगाते हैं। 
इस तरह हम देखते हैं कि अखबार और माध्यम निष्पक्ष नहीं रह गए हैं।  वे प्रचार के माध्यम भर रह गए हैं। यह जरूर हुआ है कि आपसी प्रतियोगिता के कारण सूचना को पहुँचाने की गति बहुत तीव्र हो गई है। लेकिन उस में भी गलत सूचनाओं की भरमार रहती है।  मेरे नगर की कुछ महत्वपूर्ण घटनाएं जो हिन्दी टीवी माध्यमों पर घंटे भर में ही प्रमुख समाचार बन गई थीं, के बारे में अधिकांश सूचनाएं गलत थीं। यहाँ तक कि चैनल पर दिखाए जा रहे बिलकुल गलत थे।  इस तरह सूचनाएँ जो हड़बड़ी में आ रही थीं उन में गलत अधिक थीं। दूसरे ही दिन कोई अन्य ब्रेकिंग न्यूज मिल जाने पर उन का फॉलोअप गायब था।  हम राष्ट्रीय अखबार का  जो स्थानीय संस्करण देखते हैं उस में स्थानीय समाचार होते हैं और कुछ प्रान्तीय समाचार और कुछ राष्ट्रीय समाचार। बहुत से आवश्यक समाचार उन से छूट जाते हैं। 
इन सारी परिस्थितियों में इंटरनेट सूचनाओं के श्रेष्ठ साधन के रूप में उभऱ कर सामने आया है।  जिन लोगों के पास यह सुविधा है वे अन्य किसी भी साधन की अपेक्षा खोज के माध्यम  से समाचार को खोज निकालते हैं और उस में भी सच को निकालने की योग्यता भी कुछ ही दिनों में प्राप्त कर लेते हैं।  इस बीच ब्लागिंग या चिट्ठाकारी ने भी अपनी भूमिका अदा करना आरंभ कर दी है।  यह माध्यम एकदम व्यक्तिगत है और कोई भी व्यक्ति इस माध्यम से सूचनाएँ प्रकट कर सकता है।  सूचनाओं पर अपने विचार प्रकट कर सकता है।  और वे विचार कम से कम उस व्यक्ति की स्वयं की अभिव्यक्ति होते हैं। यह दूसरी बात है कि वह व्यक्ति जिन विचारों या विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है उस का प्रभाव उस में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।  लेकिन फिर भी वे उस के अपने विचार होते हैं।  इस तरह हम देखते हैं कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इंटरनेट ने और विशेष रूप से  ब्लॉगिंग या चिट्ठाकारी ने एक नई ऊँचाई प्रदान की है।  लेकिन यह ध्यान में रखने योग्य बात है कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल संविधान प्रदत्त मूल अधिकार में ही है। (क्रमशः जारी)






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Saturday 27 June 2009

प्रेस की आजादी : स्वतंत्रता का मूल अधिकार (4)

प्रेस की आजादी
प्रेस की आजादी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक भाग है और इस कारण उसे निर्बाध रहना चाहिए। ऐसा कोई भी कानून जो प्रेस की स्वतंत्रता में बाधा पहुँचाता है वह असंवैधानिक होगा।  यदि सरकार कोई भी ऐसा कानून बनाती है कि विचारों के प्रकाशन के पूर्व उन्हें सरकार से अनुमति प्राप्त करनी होगी तो यह कानून अवैध होगा।  समाचार पत्र के प्रकाशन पर पूर्व-अवरोध (Pre-Censorship) नहीं लगाया जा सकता है। ब्रजभूषण बनाम दिल्ली राज्य (एआईआर 1950 सु.को. 129) के मामले में प्रेस की स्वतंत्रता पर पूर्ण  अवरोध की संवैधानिकता का मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया था।  इस मामले में ईस्ट पंजाब पब्लिक सेफ्टी एक्ट-1947 की धारा 7 के अंतर्गत दिल्ली के चीफ कमिश्नर ने दिल्ली के एक साप्ताहिक पत्र के संपादक को यह निर्देश दिया था कि वे उन सभी प्रकार के सांप्रदायिक मामलों, पाकिस्तान से संबंधित समाचारों, चित्रों, और व्यंग्य चित्रों को जो सरकारी समाचार ऐजेन्सियों से प्राप्त नही हुए हैं प्रकाशित करने के पूर्व सरकारी परीक्षण के लिए भेजेंगे और पूर्व अनुमति प्राप्त करने के उपरांत ही उन्हें प्रकाशित करेंगे।  सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को असंवैधानिक घोषित करते हुए निर्णय दिया कि किसी भी समाचार पत्र पर पूर्व-अवरोध लगाना प्रेस की आजादी पर अनुचित प्रतिबंध है और पूरी तरह असंवैधानिक है।


इसी तरह वीरेन्द्र बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1957 सु.को. 896) के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट कह चुका था कि किसी भी समाचार पत्र को तत्कालीन महत्व के विषय पर अपने विचार प्रकट करने से रोकना वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर का उल्लंघन है।  एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स बनाम भारत संघ (एआईआर 1958) सु.को. 578) तथा रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (एआईआर 1950 सु.को. 124) में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि किसी भी समाचार पत्र के संचालन पर पूर्व अवरोध असंवैधानिक है। भारत सरकार ने समाचार पत्रों के पृष्ठ बढ़ाने पर रोक लगाई तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा और साकल पेपर्स बनाम भारत संघ (एआईआर 1962 सु.को. 305) के मामले में यह निर्णय दिया कि समाचार पत्रों के पृष्ठ बढ़ाने पर रोक लगाना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है क्यों कि इस से विचारों का प्रकाशन बाधित होता है। इसी तरह बैनेट कोलमेन एण्ड कंपनी बनाम भारत संघ (एआईआर 1973 सु.को. 106) में अखबारी कागज नीति और अखबारी कागज नियंत्रण आदेश 1962 में समाचार पत्रों की पृष्ठ संख्या पर प्रतिबंध को अनुचित बताया था। 
विज्ञापनों को भी विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम माना गया है और उन पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। लेकिन यदि विज्ञापन व्यापारिक प्रकृति के हैं तो उन पर यथोचित कर लगाए जा सकते हैं। हमदर्द दवाखाना बनाम भारत संघ (एआईआर 1960 सु.को. 554) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जादू के गुणों वाली औषधि के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाना उचित है क्यों कि यह निषिद्ध औषधियों के विज्ञापन और व्यापार व व्यवसाय से संबद्ध है।

लेकिन किसी प्रेस में औद्योगिक संबंधों को विनियमित करने वाले कानून जिन के अधीन प्रेस के कर्मचारियों के सेवा संबंधी मामले आते है कानूनों को प्रेस की आजादी और वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक नहीं माना है।  लेकिन प्रेस की स्वतंत्त्रता को संसदीय विशेषाधिकारों के अधीन माना गया है कोई भी प्रकाशक किसी सांसद या विधायक के भाषण का वह अंश प्रकाशित नहीं कर सकता जिसे स्पीकर के आदेश द्वारा संसद की कार्यवाही से निकाल दिया गया है।

प्रेस की तरह ही ब्लागिरी भी विचारों को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम है। अगला आलेख इसी विषय पर होगा। (क्रमशः जारी)

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Thursday 25 June 2009

बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी : स्वतंत्रता का मूल अधिकार (3)

वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (क) भारतीय नागरिकों को भारत में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।  यह अधिकार जनतांत्रिक शासन व्यवस्था की नींव है। सरकार के लिए इस स्वतंत्रता को महत्व देना अत्यंत आवश्यक है।  जनता को प्राप्त यही स्वतंत्रता शासन को आईना दिखाती है।  इस पर प्रतिबंध का असर हम 1975 से 1977 के काल में देख चुके हैं, जब आपातकाल में इसे बाधित कर दिया था। नतीजा यह रहा कि 1977 के आम चुनाव में काँग्रेस को मुहँ की खानी पड़ी और पहली बार केन्द्र में गैर काँग्रेसी सरकार का गठन हुआ। 

वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ
वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ है शब्दों, लेखों, मुद्रणों, चिन्होंस अंकों अथवा किसी भी अन्य प्रकार से अपने विचारों को प्रकट करना।  अभिव्यक्ति  किसी भी माध्यम द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा अपने विचारों को अन्य व्यक्ति तक पहुँचाना है।  इस तरह विचारों को प्रकट करने के जितने भी साधन हैं वे इस के अंतर्गत आ जाते हैं। प्रेस और माध्यमों की आजादी इसी के अंतर्गत आ जाती है।  विचारों का स्वतंत्र प्रसारण ही इस आजादी का मुख्य उद्देश्य है।  सरकार के संचालन की समस्त सूचनाओं को जानने का अधिकार इसी में निहीत है।  केवल देश की सुरक्षा अथवा लोकहित में ही इन सूचनाओं को रोका जाना संभव है। यदि अखबार प्रकाशित हो जाए और उसे लोगों तक पहुँचने से रोक दिया जाए तो ऐसे प्रकाशन का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा। इसी में परिचालन की स्वतंत्रता भी निहीत है। (रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य एआईआर 1960 सु.को.124) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल अपने विचारों तक ही सीमित नहीं है, इस में अन्य व्यक्तियों के विचारों का प्रचार-प्रसार भी सम्मिलित है। (श्री निवास बनाम मद्रास राज्य, एआईआर 1951 मद्रास 79)

इण्डियन एक्सप्रेस  (इण्डियन एक्सप्रेस न्यूज पेपर्स बनाम भारत संघ (1985 एससीसी 641) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व्यक्ति की आत्मोन्नति में व सत्य की खोज में सहायक होती है तथा व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता को सशक्त बनाने और स्थिरता व सामाजिक परिवर्तन में उपयोगी सामंजस्य बनाने के चार विशेष उद्देश्यों की पूर्ति करती है।


  प्रेस की स्वतंत्रता

अमरीका के प्रेस कमीशन ने प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है।  जिस समाज में मनुष्य अपने विचार स्वतंत्र रूप से दूसरों तक नहीं पहुँचा सकता वहाँ अन्य स्वतंत्रताएँ भी सुरक्षित नहीं रह सकतीं।  जहाँ वाक् स्वातंत्र्य है वहीं स्वतंत्र समाज आरंभ होता है। स्वतंत्रता को बनाए रखने के सभी साधन मौजूद रहते हैं।  भारतीय प्रेस कमीशन ने भी ऐसे ही विचार व्यक्त किए हैं -"जनतंत्र  केवल विधान मंडल की सचेत देखभाल में ही नही अपितु लोकमत की देखभाल और मार्गदर्शन के अंतर्गत फलता फूलता है। प्रेस की ही यह सब से बड़ी विशेषता है कि उस ेक माध्यम से लोकमत अभिव्यक्त होता है।

अमरीका की ही तरह भारतीय संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता का पृथक से उल्लेख नहीं है।  लेकिन डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि प्रेस को कोई विशेषाधिकार नहीं दिए जा सकते जो आम नागरिक को प्राप्त नहीं हैं। प्रेस में संपादक, संवाददाता और लेखक अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग करते हैं। इस कारण से किसी विशेष उपबंध की आवश्यकता नहीं है।  सुप्रीम कोर्ट ने साकल पेपर्स लि. बनाम भारत संघ (एआईआर 1962 सु.को. 305) में निर्धारित किया कि वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता भी सम्मिलित है। प्रेस विचारों को अभिव्यक्त करने का माध्यम मात्र हैं। यह स्वतंत्रता उन निर्बंधनों के अधीन है जो कि अनुच्छेद 19 (2) द्वारा नागरिकों के वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए हैं और लगाए जा सकते हैं।

प्रेस को साक्षात्कार के माध्यम से जानने की स्वतंत्रता है लेकिन परम स्वतंत्रता नहीं है। उस पर निर्बंधन लगाए जा सकते हैं। प्रेस नागरिकों से सूचनाएँ तभी प्राप्त कर सकता है जब वे अपनी इच्छा से सूचना देना चाहें। प्रभुदत्त बनाम भारत संघ (एआईआर 1982 सु.को. 6)  में यह निर्णय दिया गया कि मृत्युदंड के अभियुक्त अपनी इच्छा से कोई बात बताना चाहते हैं तो तो प्रेस को उन से पूछने की अनुमति दी जानी चाहिए, और यदि ऐसी अनुमति नहीं दी जाती है तो उस के कारणों को बताना चाहिए।(क्रमशः जारी)




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Wednesday 24 June 2009

स्वतंत्रता का मूल अधिकार (2) युक्तियुक्त निर्बंधन

पिछले आलेख में हम ने स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधनों (Restrictions) की बात की थी। हमें समझना होगा कि ये युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं? और इन की कसौटी क्या हो सकती है?






युक्तियुक्त निर्बंधन

युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं? यह सदैव ही एक कठिन विषय रहा है। युक्तियुक्तता पर विधायिका (संसद और विधानसभा) के निर्णय अंतिम नहीं हैं। निर्बंधनों की युक्तियुक्तता का निर्धारण करना न्यायालयों का कार्य है। यह युक्तियुक्त शब्द न्यायालय की पुनर्विलोकन की शक्ति को बहुत विस्तृत कर देता है। लेकिन युक्तियुक्तता को जाँचने के लिए कोई निर्धारित कसौटी भी नहीं है और इस का निर्णय सदैव ही परिस्थितियों के आधार पर किया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से कुछ सामान्य सिद्धांत स्थापित हुए हैं जिन के आधार पर युक्तियुक्तता की जाँच की जाती है।

युक्तियुक्तता के सामान्य स्थापित सिद्धांत

  1. युक्तियुक्तता पर अंतिम निर्णय देने की शक्ति न्यायालय की है न कि विधायिका की।
  2. नागरिकों के अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन न्यायपूर्ण और सामान्य जनता के हित में होने चाहिए, उस से अधिक नहीं। वैयक्तिक हित और सामाजिक हितों में सामंजस्य का प्रयास होना चाहिए। लगाए गए निर्बंधन और उस के उद्देश्य में सामंजस्य रहे और उन में तर्कसंगत संबंध हों। यदि विधि स्वैच्छाचारी और आवश्यक से अधिक निर्बंधन के संबंध में कोई विधि बनाती है तो उसे अवैध घोषित करने का अधिकार न्यायालय को है।

  3. युक्तियुक्तता का कोई सामान्य आधार नहीं हो सकता। प्रत्येक मामले की परिस्थतियों और तथ्यों पर वह निर्भर करेगा। यह मानदंड उस अधिकार की प्रकृति जिस पर निर्बंधन लाया जा रहा है, लगाए गए निर्बंधन के अन्तर्निहीत प्रयोजन, बुराई की मात्रा, उसे दूर करने की अनिवार्यता,निर्बंधन लगाने के अनुपात में भिन्नता और समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बदलता रहता है। न्यायिक निर्णय के लिए इन सब बिन्दुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है।
  4. लगाए जा रहे निर्बंधनों को मौलिक विधि और प्रक्रियात्मक विधि दोनों दृष्टिकोण से युक्तिपूर्ण होना आवश्यक है। इस कारण से न्यायालय को निर्बंधनों की अवधि और मात्रा ही नहीं उन की परिस्थितियों और उन्हें लागू करने के लिए प्राधिकृत किए गए तरीके पर भी विचार करना चाहिए।
  5. राज्य की नीति निर्देशक तत्वों में निहीत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लगाए गए निर्बंधन युक्तियुक्त माने जा सकते हैं।
  6. जब न्यायालय किसी निर्बंधन की युक्तियुक्तता पर विचार करें तो उन का दृष्टिकोण वस्तुनिष्ठ (Objective) होना चाहिए न कि व्यक्तिनिष्ठ (Subjective)। युक्तियुक्तता का मानदंड एक औसत विवेकशील व्यक्ति के जैसा होना चाहिए और न्यायाधीश की व्यक्तिगत सामाजिक, आर्थिक विचारधारा से प्रेरित नहीं होना चाहिए। न्यायाधीशों को दायित्व की भावना और आत्मनियंत्रण से काम लेना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि संविधान केवल उन की विचारधारा वाले व्यक्तियों के लिए नहीं बनाया गया है, अपितु सभी के लिए, और जनता के प्रतिनिधियों ने निर्बंधनों को युक्तियुक्त मानकर ही लगाया होगा।
  7. अनुच्छेद 19(1) में दिए गए अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन केवल अनुच्छेद 19(2) से 19(6) तक में वर्णित आधारों पर ही लगाए जा सकते हैं। अन्य किसी आधार पर लगाए गए निर्बंधन अवैसंवैधानिक होंगे।
  8. न्यायालय कानून की युक्तियुक्तता का निर्धारण नहीं कर सकते उन्हें केवल यह देखना है कि नागरिक अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन युक्तियुक्त हैं या नहीं।
  9. निर्बंधन निषेधात्मक भी हो सकते हैं। कुछ विशेष मामलों में नागरिकों के पूर्ण अधिकार पर रोक लगाने के निर्बंधन भी युक्तियुक्त हो सकते हैं। खतरनाक व्यापारों और उत्पादनों पर रोक लगाना जैसे, शराब, नशीले पौधे उगाना, औरतों का क्रय विक्रय करना आदि युक्तियुक्त निर्बंधन हैं। प्रत्येक नागरिक को विधिपूर्ण वाणिज्य का पूरा अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का प्रयोग उसे युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन ही करना होगा। उस पर ऐसे निर्बंधन लगाए जा सकते हैं जिसे सरकार समाज की सुरक्षा, शान्ति-व्यवस्था एवं नैतिकता इत्यादि के लिए आवश्यक समझती है।
अगले आलेख में हम अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता पर चर्चा करेंगे। ........ (क्रमशः)

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Tuesday 23 June 2009

स्वतंत्रता का मूल अधिकार (1)


 मूल अधिकारों में स्वतंत्रता के अधिकार का स्थान सर्वोच्च है, क्यों कि इस अधिकार के अभाव में किसी भी मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास संभव नहीं।  भारतीय संविधान में स्वतंत्रता के मूल अधिकार को अनुच्छेद 19 से 22 तक में स्थान दिया गया है जिन में भारत के नागरिकों को विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रताओं के अधिकार दिए गए हैं।  अनुच्छेद 19 में छह तरह की स्वतंत्रताओं का उल्लेख है।  यह अनुच्छेद निम्न प्रकार है-


अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त अधिकार केवल नागरिकों को ही प्राप्त हैं।  जो व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है वह इन अधिकारों का उपयोग नहीं कर सकता।  भारत में पंजीकृत कोई कंपनी भी इन का उपयोग नहीं कर सकती क्यों कि वह नागरिक नहीं हो सकती है।

अनेक बार लोग यह समझ बैठते हैं कि ये नागरिक स्वतंत्रताएँ असीमित हैं।  किसी भी देश के नागरिकों के अधिकार असीमित नहीं हो सकते।  एक व्यवस्थित समाज में ही अधिकारों का अस्तित्व बना रह सकता है।  इस कारण से नागरिकों को ऐसे अधिकार प्रदान नहीं किए जा सकते जो पूरे समाज के लिए अहितकर सिद्ध हो जाएँ।  यदि इन अधिकारों पर कोई निर्बंधन या नियंत्रण (Restriction) न रहे तो उस का परिणाम समाज के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।  स्वतंत्रता का अस्तित्व  तब तक ही संभव हो सकता है जब तक कि वे कानून द्वारा सयंमित रहें।  कोई भी नागरिक को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए किसी दूसरे व्यक्ति के अधिकारों को आघात नहीं पहुँचाता है।  सर्वोच्च न्यायालय ने ए.के.गोपालन ( एआईआर 1951 सुप्रीम कोर्ट) के मामले में कहा कि "मनुष्य एक विचारशील प्राणी होने के कारण बहुत सी वस्तुओं की इच्छा रखता है,  लेकिन एक नागरिक समाज में उसे अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना पड़ता है और दूसरों का आदर करना पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 19 के खंड (2) से (6) के अधीन राज्य को 'लोकहित' में आवश्यक किंतु युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की शक्ति प्रदान की गई है।"  इस तरह इन निर्बंधनों को लगाने की दो शर्तें हैं। पहली तो यह कि वे केवल अनुच्छेद 19 के खंड (2) से (6) में वर्णित आधारों पर ही लगाई जा सकती हैं और दूसरा यह कि उन का युक्तियुक्त होना आवश्यक है।

अगले आलेख में हम देखेंगे कि ये युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं?................(क्रमशः)


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Sunday 21 June 2009

अदालत क्या करे? 1500 से अधिक मुकदमे अन्तिम बहस में

बाल श्रम उन्मूलन पर हुई परिचर्चा के दिन ही श्रम न्यायालय, कोटा की जज साहिबा से बात हुई थी।  वे बता रही थीं कि अदालत में साढ़े चार हजार मुकदमे लंबित हैं।  1500 से अधिक मुकदमें तो अन्तिम बहस में लगे हैं।  रोज कम से कम 20 से 25 मुकदमे बहस के लिए लगते हैं।  केवल बहस ही सुनी जाए तो अदालत के दिन भर के समय में केवल तीन या चार मुकदमों में बहस सुनी जा सकती है। यदि उन में उसी दिन निर्णय भी लिखाना हो तो अधिक से अधिक दो मुकदमे निपटाए जा सकते हैं।  ऐसे में अन्य मुकदमों में जो गवाहियाँ और  मुकदमों के बीच में प्रक्रिया संबंधी बिन्दुओं पर होने वाली बहसें तो सभी मुल्तवी करनी पड़ेगी। तब जा कर एक दिन में अधिक से अधिक तीन-चार निर्णय किए जा सकते हैं।  कुल 70 से अस्सी मुकदमे रोज की सूची में रखने पड़ रहे हैं।  यह हालत तो तब है, जब मुकदमों में अगली पेशी तीन से छह माह की दी जा रही है।  अन्तिम बहस के लिए सूची में रखे मुकदमों में से 18-20 में रोज केवल पेशी बदलनी पड़ रही है। पेशी बदलने पर मुवक्किल और वकील बहुत जद्दोजहद करते हैं। जल्दी लगाने को कहते हैं।  लेकिन अदालत जल्दी लगा नहीं सकती। जितने अधिक मुकदमे रोज लगेंगे उतने ही रोज बदलने पड़ेंगे। अदालत का दो ढ़ाई घंटे का समय इस पेशी बदलने की जद्दोजहद में बरबाद हो रहा है।  बस एक ही इलाज नजर आता है कि सरकार कम से कम एक श्रम न्यायालय कोटा में और खोल दे।  दूसरा रास्ता यह है कि न्याय चाहने वाला थक हार कर खुद ही अपना मुकदमा अदालत से वापस ले ले।

मेरी डायरी  बता रही थी कि गुरुवार को कुल 12 मुकदमे श्रम न्यायालय में अन्तिम बहस के लिए मुकर्रर हैं।  इन में से नौ कोटा ताप विद्युत परियोजना  के उन श्रमिकों के थे जिन्हें परियोजना के पहले ही बिजलीघर के आरंभ होने के समय नियोजित कर लिया गया था। अनेक वर्षों तक इन की नियुक्ति को नियमित न कर दैनिक वेतन पर काम लिया गया।  करीब आठ वर्षों के उपरांत उन्हें नियमित किया गया।  उन की मांग थी कि वे ही थे जिन्हों ने इस बिजलीघर को सब से पहले आरंभ किया।  इस लिए उन्हें उसी तिथि से नियमित किया जाना चाहिए जब उन्हें बिजलीघर में काम करते दो वर्ष पूरे हो गए थे। ये मुकदमे 1997-98 से  इसी अदालत में चल रहे हैं।  लगभग पाँच वर्ष पूर्व ही इन में गवाही ली जा चुकी है और तभी से ये अन्तिम बहस में चल रहे हैं।  अभी तक किसी भी जज ने इन में बहस पूरी करने का प्रयास नहीं किया।  सभी मुकदमों में विधि का एक ही बिन्दु है जिस से इन की सुनवाई एक साथ की जा सकती है।

उक्त  मुकदमों के अतिरिक्त तीन मुकदमे कोटा की बंद हो चुकी जे. के. सिंथेटिक्स लि. के उद्योगों से सम्बन्धित हैं। ये तीनों मुकदमे अवैधानिक सेवा समाप्ति के मुकदमे हैं।  जो 1991-93 से चल रहे हैं।

मैं इन बारह मुकदमों का अध्ययन कर अदालत पहुँचा कि यदि इन  में से दो-तीन मुकदमे भी सुने जा सके तो मेरी अलमारी में कुछ स्थान बनेगा।  लेकिन जब मैं अदालत पहुँचा तो अदालत विरोधी वकीलों को बुलवा कर उन से पूछ रही थी कि क्या इन मुकदमों में कोई समझौता नहीं हो सकता?  वकील अपने  उद्योगपति मुवक्किलों की गरीबी का बखान करते हुए तर्क दे रहे थे कि समझौता संभव नहीं है।  मैं ने अदालत से अनुरोध किया कि इन मुकदमों में इस अदालत में अब तक पीठासीन रहे सभी जज इस तरह का प्रयास कर चुके हैं।  इन में समझौता संभव नहीं है। यदि होना होता तो अब तक कभी का हो चुका होता। अदालत  ने अपने काम की अधिकता के सांख्यिकी बताना आरंभ कर दिया।  बताया गया कि कम से कम पच्चीस मुकदमे बहस के लिए लगे हैं और अदालत आज इन मुकदमों में बहस के लिए पूर्व तैयारी नहीं कर सकी है। इस कारण से आज इन मुकदमों को नहीं सुन सकेगी।  मैं ने बहुत कहा कि मैं इन सब मुकदमों में तैयार हो कर आया हूँ।  इन्हें देखने में घंटों खर्च किए हैं।  लेकिन सारे तर्क बेकार गए।  सभी मुकदमों की सुनवाई मुल्तवी कर दी गई और सब में अक्टूबर माह में पेशी नियत कर दी गई।  बीच में पूरे चार माह हैं।  चार माह में बारह मुकदमों की तफसील याद रखना संभव नहीं।  मुझे इन मुकदमों में फिर से बहस की तारीख के ठीक पहले घंटों तैयारी करना होगा। जो मैं पहले ही कम से कम चार बार कर चुका हूँ।  मेरी चार बार की तैयारी तो बेगार हो चुकी है।  अगली पेशी के लिए जो तैयारी करूंगा वह बेगार नहीं होगी उस का विश्वास मैं कर पाने में असमर्थ हूँ।

 इस समस्या का एक ही इलाज है कि इस अदालत के मुकदमों के निपटारे के लिए कम से कम एक अतिरिक्त अदालत की और स्थापना हो और वहाँ केवल अंतिम बहस के सब से पुराने पाँच सौ मुकदमे स्थानान्तरित कर दिए जाएँ। जब उन में से आधों का निपटारा हो चुके तो फिर से ढाई सौ मुकदमे अंतिम बहस के लिए उस अदालत में स्थानांतरित कर दिए जाएँ।  नई अदालत को सभी वे साधन और सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ जो शीघ्र मुकदमों के निपटारे के लिए जरूरी हैं।  इस के अलावा यह भी कि राज्य सरकार इस अदालत के लिए ऐसे सक्षम जज की नियुक्ति के लिए उच्च-न्यायालय को लिखे जिस का इस तरह के मुकदमों के निपटारे का रिकॉर्ड अच्छा हो।  इस के लिए इस अदालत में पैरवी करने वाले सभी अभिभाषक  अपनी अभिभाषक परिषद और बार कौंसिल को सक्रिय हो कर राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए कह रहे हैं।  साथ ही यह भी प्रयास है कि वे मुवक्किल जो न्याय चाहते हैं वे भी इस काम में अपना सहयोग करें।  अन्तिम रूप से हानि तो सब से अधिक उन की ही हो रही है।

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Friday 19 June 2009

बाल श्रम के लिए निषिद्ध प्रक्रियाएँ और व्यवसाय तथा जिज्ञासाओं के उत्तर

बाल श्रम उन्मूलन पर लिखे गए पिछले दो आलेखों में से पहले बाल श्रम उन्मूलन पर एक लघु परिचर्चा पर ताऊ रामपुरिया जी की जिज्ञासा थी कि "क्या चार घंटे के लिये बाल श्रमिक रखे जा सकते हैं" उन की जिज्ञासा का उत्तर प्रतिटिप्पणी में उसी दिन दे दिया गया था। जो निम्न प्रकार था-

@ताऊ रामपुरिया, ताऊ जी, उक्त रिपोर्ट में यह कहीं नहीं है कि 14 वर्ष से कम आयु के बालकों के काम के घंटे चार से अधिक नहीं होने चाहिए।वास्तविकता तो यह है कि कुछ कामों और प्रक्रियाओं में ही बाल श्रम का कानून द्वारा उन्मूलन किया गया है। शेष स्थानों पर बाल श्रम लिया जाना कानून में बाधित नहीं किया गया है।  मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि 14 वर्ष से कम आयु के बाल-श्रम का तो पूरी तरह से उन्मूलन कर दिया जाना चाहिए।  हाँ, 14 वर्ष की उम्र में यदि विवशता हो तब भी 18 वर्ष तक की उम्र तक उन से केवल चार घंटे ही काम लिया जाना चाहिए।  इस संबंध में कानून की स्थिति अगले आलेख में रखने का प्रयत्न रहेगा।

मैं ने कानून की स्थिति पिछले आलेख में स्पष्ट कर दी थी।  जिस से स्पष्ट है कि इस अधिनियम के द्वारा केवल कुछ प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों में बाल श्रम के नियोजन को निषिद्ध किया गया है। इन प्रक्रियाओं और व्यवसायों के अतिरिक्त अन्यत्र बाल श्रमिक नियोजित किए जा सकते हैं। लेकिन केवल इस अधिनियम की शर्तों के अंतर्गत।  अधिनियम में यह व्यवस्था है कि जहाँ भी बाल श्रमिक नियोजित किए जा सकते हैं वहाँ उन के काम के घंटों की अवधि छह घंटे प्रतिदिन तक की हो सकती है।  मेरा उस परिचर्चा में कथन था कि 14 वर्ष तक की आयु तक तो बाल श्रमिकों का नियोजन पूरी तरह से निषिद्ध किए जाने तथा जहाँ 14 वर्ष की उम्र प्राप्त कर लेने पर 18 वर्ष की उम्र का होने तक उन से चार घंटों से अधिक काम लिए जाने को निषिद्ध किए जाने को को लक्ष्य बना लिया जाना चाहिए।  हालांकि आज जो स्थिति है उस में बाल श्रम को निषिद्ध किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है।  क्यों कि अभी तक तो जो अधिनियम प्रभाव में है उसे ही पूरी तरह लागू किया जाना संभव नहीं हो सका है।  उच्चतम न्यायालय के जिस निर्णय का उल्लेख पिछले आलेख में है, उस के उपरांत इस अधिनियम को लागू करने के मामले में तेजी आई है तथा बाल कल्याण और शिक्षा के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों ने धन बी उपलब्ध कराया है।  लेकिन जनजागृति की स्थिति पहले जैसी ही है। इस क्षेत्र में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं की कमी है।  जो गैरसरकारी संगठन इस क्षेत्र में काम करते दिखाई देते हैं वे भी इस नाम पर खर्च किए जा रहे धन का उपयोग करने के लिए अधिक काम कर रहे हैं।  सामाजिक चेतना जैसी बात वहाँ दिखाई नहीं पड़ती। हालांकि कुछ संस्थाएँ इस क्षेत्र में उल्लेखनीय काम कर रही हैं पर उन की संख्या बहुत कम और नगण्य है।


आलेख बाल श्रम उन्मूलन पर एक लघु परिचर्चा पर श्री अन्तर सोहिल ने प्रश्न पूछा था कि "जो बाल कलाकार फिल्मों और सीरियल आदि में काम करते हैं, क्या वह भी बाल श्रमिक हैं?
उन के प्रश्न के उत्तर में मेरा यह कहना है कि 14 वर्ष तक के व्यक्तियों को अधिनियम में बालक परिभाषित किया गया है।  इस तरह किसी भी कार्य में 14 वर्ष तक के बालक को नियोजित किया जाएगा तो वे बाल श्रंमिक ही कहे जाएंगे।  इन बाल श्रमिकों से अधिनियम की शर्तों के अंतर्गत ही काम लिया जा सकता है।  उन के काम के कुल घंटे एक दिन में 6 से अधिक नहीं हो सकते तथा उन से केवल तीन घंटे लगातार काम लिया जा सकता है। उस के उपरांत उन्हें एक घंटे का पूर्ण विश्राम देना आवश्यक है।  इन छह और तीन घंटों में वह समय भी सम्मिलित है जो काम दिए जाने की प्रतीक्षा में बाल श्रमिक को कार्यस्थल पर गुजारने पड़ते हैं।  मनोरंजन के क्षेत्र में अर्थात टीवी या सिनेमा के लिए काम करने वाले बाल श्रमिकों को उन्हें काम मिलने के लिए प्रतीक्षा में बिताए घंटे भी उन के काम के घंटों में सम्मिलित होंगे।  जैसे कोई बाल अभिनेता सैट पर आता है तो उस के काम के घंटे उस के मेकप के आरंभ से ही आरंभ हो जाएंगे तथा किसी शॉट के लिए प्रतीक्षा का समय भी उस में सम्मिलित होगा। 

विगत आलेख लंबा हो जाने के कारण उस के साथ बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 में निषिद्ध प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों की सूचियाँ प्रकाशित नहीं की जा सकीं थीं उन्हें आज यहाँ जोड़ा जा रहा है। इन्हें देवनागरी में टाइप नहीं किया जा सका है इस के लिए अग्रिम क्षमा याचना है। 

बाल श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 में वर्णित प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों की सूचियाँ......
THE SCHEDULE
(See Sec. 3)

PART  A
Occupations

Any occupation concerned with: -

         1. Transport of passengers, goods or mails by railways;
         2. Cinder picking, clearing of an ash pit or building operation in the railway premises;
         3. Work in a catering establishment at a railway station, involving the movement of a vendor or any other employee of the establishment from the one platform to another or in to or out of a moving train;
         4. Work relating to the construction of a railway station or with any other work where such work is done in close proximity to or between the railway lines;
         5. A port authority within the limits of any port;
      * 6    Work relating to selling of crackers and fireworks in shops with temporary licenses;
      # 7    Abattoirs/Slaughter House;
      $ 8    Automobile workshops and garages;
         9. Foundries;
        10. Handling of toxic or inflammable substances or explosives;
        11. Handloom and power loom industry;
        12. Mines (underground and under water) and collieries;
        13. Plastic units and fiberglass workshops;

PART  B
Processes
 
         1. Beedi-making.
         2. Carpet-weaving.
         3. Cement manufacture, including bagging of cement.
         4. Cloth printing, dyeing and weaving.
         5. Manufacture of matches, explosives and fire-works.
         6. Mica-cutting and splitting.
         7. Shellac manufacture.
         8. Soap manufacture.
         9. Tanning.
        10. Wool-cleaning.
        11. Building and construction industry.
      * 12     Manufacture of slate pencils (including packing).
      * 13     Manufacture of products from agate.
      * 14   Manufacturing processes using toxic metals and substances such as lead, mercury, manganese, chromium, cadmium, benzene, pesticides and asbestos.
      # 15   “Hazardous processes” as defined in Sec. 2 (cb) and ‘dangerous operation’ as notice in rules made under section 87 of the Factories Act, 1948 (63 of 1948)
      # 16   Printing as defined in Section 2(k) (iv) of the Factories Act, 1948 (63 of 1948)
      # 17   Cashew and cashewnut descaling and processing.
      # 18   Soldering processes in electronic industries.
      $ 19   ‘Aggarbatti’ manufacturing.
        20. Automobile repairs and maintenance including processes incidental thereto namely, welding, lathe work, dent beating and painting.
        21. Brick kilns and Roof tiles units.
        22. Cotton ginning and processing and production of hosiery goods.
        23. Detergent manufacturing.
        24. Fabrication workshops (ferrous and non ferrous)
        25. Gem cutting and polishing.
        26. Handling of chromite and manganese ores.
        27. Jute textile manufacture and coir making.
        28. Lime Kilns and Manufacture of Lime.
        29. Lock Making.
        30. Manufacturing processes having exposure to lead such as primary and secondary smelting, welding and cutting of lead-painted metal constructions, welding of galvanized orzinc silicate, polyvinyl chloride, mixing (by hand) of crystal glass mass, sanding or scraping of lead paint, burning of lead in enameling workshops, lead mining, plumbing, cable making, wiring patenting, lead casting, type founding in printing shops.  Store type setting, assembling of cars, shot making and lead glass blowing.
        31. Manufacture of cement pipes, cement products and other related work.
        32. Manufacture of glass, glass ware including bangles, florescent tubes, bulbs and other similar glass products.
        33. Manufacture of dyes and dye stuff.
        34. Manufacturing or handling of pesticides and insecticides.
        35. Manufacturing or processing and handling of corrosive and toxic substances, metal cleaning and photo engraving and soldering processes in electronic industry.
        36. Manufacturing of burning coal and coal briquettes.
        37. Manufacturing of sports goods involving exposure to synthetic materials, chemicals and leather.
        38. Moulding and processing of fiberglass and plastic.
        39. Oil expelling and refinery.
        40. Paper making.
        41. Potteries and ceramic industry.
        42. Polishing, moulding, cutting, welding and manufacturing of brass goods in all forms.
        43. Processes in agriculture where tractors, threshing and harvesting machines are used and chaff cutting.
        44. Saw mill – all processes.
        45. Sericulture processing.
        46. Skinning, dyeing and processes for manufacturing of leather and leather products.
        47. Stone breaking and stone crushing.
        48. Tobacco processing including manufacturing of tobacco, tobacco paste and handling of tobacco in any form.
        49. Tyre making, repairing, re-treading and graphite benefication.
        50. Utensils making, polishing and metal buffing.
        51. ‘Zari’ making (all processes)’.
    @ 52.  Electroplating;
        53.  Graphite powdering and incidental processing;
        54.  Grinding or glazing of metals;
        55.  Diamond cutting and polishing;
        56.  Extraction of slate from mines;
        57.  Rag picking and scavenging.

1. for item (2), the following item shall be substituted, namely:-

                  ‘(2) carpet weaving including preparatory and incidental process thereof”;

 2. for item(4), the following item shall be substituted, namely:-

                  “(4) cloth printing, dyeing and weaving including processes preparatory and incidental thereto:

 c.   for item (11)  the following shall be substituted, namely:- 

                  “(11) Building and Construction Industry including processing and polishing of granite stones”.


  *   Ins. by Notification No. S.  O. 404(E) dated the 5th June 1989 published   in the Gazette of India, Extraordinary.

  #   Ins.  by Notification No. S. O. 263 (E) dated 29th March, 1994 published in the Gazette of India, Extraordinary.

  $  Ins. Sr. No. 8-13 in Part A and Sr. No. 19-51 in Part B by Notification No. S. O. 36 (E) dated 27th January 1999              published in the Gazette of India, Extraordinary.

 @ Ins.Sr. No. 52 – 57 part B  by Notification No. S.O. 397 (E) dated the 10th May 2001 published in the Gazette of India, Extraordinary. 

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Thursday 18 June 2009

क्या कहता है? बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम,

पिछले आलेख पर आई टिप्पणियों से लगा कि भारत में बाल-श्रम के प्रतिषेध के लिए वर्तमान कानून की जानकारी के बारे में बहुत जानकारी आम नहीं है।  वर्तमान में देश में  बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 प्रभावी है। जिस के सामान्य प्रावधान निम्न प्रकार हैं...
   
बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 
इस अधिनियम का उद्देश्य समूचे बाल श्रम का उन्मूलन करना नहीं है, यह केवल कुछ प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों में बाल श्रम के नियोजन को निषिद्ध करता है, जहां नियोजन निषिद्ध नही है, वहां बाल श्रमिकों की सेवा दशाओं को विनियमित करता है, 14 वर्ष की उम्र तक के बालकों को शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करता है और उनकी कोमल अवस्था के विपरीत उनसे कठिन कार्य लेने पर रोक लगाता है तथा विभिन्न श्रम कानूनों में बालक (चाइल्ड) की परिभाषा को एक रूप देता है। इन्हीं उद्देश्यों से इस अधिनियम को विनिर्मित किया जाना इस अधिनियम में कहा गया है।

बाल श्रमिक की परिभाषा    
ऐसे श्रमिक जिन्होंने अपनी आयु के 14 वर्ष पूर्ण न किये हों इस अधिनियम की धारा -2 (II) के अन्तर्गत इस अधिनियम द्वारा "बालक" के रूप में परिभाषित किए गए हैं।

बाल श्रम पूर्ण रूप से निषेध 
अधिनियम की धारा-3 के अधीन भाग (अ) मे उल्लिखित व्यवसायों तथा भाग (ब) में उल्लिखित प्रक्रियाओं को खतरनाक घोषित करते हुये बाल श्रम नियोजित किया जाना पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है। कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 की व्यवस्था के अनुसार इन उद्योगों  में चाहे वे खतरनाक अथवा गैर खतरनाक प्रकृति के हों इस अधिनियम द्वारा बाल श्रम पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है।

बाल श्रम नियोजन का नियमन    
धारा-6 से 11- धारा-3 में उल्लिखित अनुसूची से भिन्न गैर खतरनाक अधिष्ठानों में बालकों को नियोजित किया जा सकता है।


बाल श्रमिक नियोजन की शर्तें    
बाल श्रमिकों को जहाँ नियोजित किया जा सकता है वहाँ उन्हें केवल निम्न की शर्तों के साथ ही नियोजित किया जा सकता है-
  • बाल श्रमिक से किसी भी दिन लगातार 3 घन्टे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता है। तीन घंटे काम लेने के उपरांत या उस से पहले बालक को न्यूनतम एक घंटे का विश्राम काल देना आवश्यक  है।
  • बाल श्रमिक के कार्य के घन्टे विश्राम काल ( न्यूनतम एक घन्टा ) को सम्मिलित करते हुए छह घन्टे से अधिक नहीं हो सकते। अर्थात उन से दिन में पाँच घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस में वह समय भी सम्मिलित है जिस समय उसे काम देने के लिए प्रतीक्षा कराई जाती है।
  • बाल श्रमिक को सप्ताह में एक दिन अवकाश दिया जाना अनिवार्य किया गया है।
  • सांय 07 बजे से प्रातः 08 बजे के मध्य बाल श्रमिक से कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • बाल श्रमिक से ओवरटाईम कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के नियोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जाना आवश्यक कर दिया गया है।
अभिलेख    
प्रत्येक नियोजक को बाल श्रमिक का उपस्थित रजिस्टर पृथक से रखना अनिवार्य है, जिसमें वह उसका नाम, जन्मतिथि, कार्य का प्रकार, कार्य के घण्टे, अवकाश का समय आदि रखेगा।

बाल श्रम नियोजित करने हेतु नोटिस    
नियोजक यदि बाल श्रमिक नियोजित करता है तो बाल श्रमिक के पूर्ण विवरण की सूचना क्षेत्र के निरीक्षक को पूर्ण विवरण सहित 30 दिन के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है।

दण्ड 
इस अधिनियम की धारा-14 एवं 15 में निषिद्ध नियोजन सम्बन्धी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले नियोजक को प्रथम अपराध पर न्यूनतम तीन माह की कैद जो एक वर्ष तक भी हो सकती है या दस हजार रूपये अर्थदण्ड जो बीस हजार रूपये तक भी हो सकता है अथवा दोनो दण्डों से दण्डित किया जा सकता है। अधिनियम के अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले को एक माह तक की सजा या दस हजार रूपये तक अर्थदण्ड अथवा दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 के अधीन जहां भी बाल श्रम नियोजन निषिद्ध है के प्रावधानों का उल्लंघन भी इस अधिनियम की धारा-14 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है।

आयु का प्रमाण    
बाल श्रमिक की आयु के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न होने पर राजकीय चिकित्सक द्वारा आयु के सम्बन्ध में प्रदत्त प्रमाण पत्र को ही मान्य कर दिया गया है।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देश

   
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एम0 सी0 मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य ( 465/86) में दिये गये ऎतिहासिक निर्देश निम्नांकित बिन्दुओं में समाहित हैं -

  • प्रतिकर की वसूली-
खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिक नियोजित करने वाले सेवायोजकों से रूपया 20 हजार तक प्रतिकर भी वसूला जाये।
  • शिक्षा व्यवस्था।
खतरनाक उद्योगों से बाल श्रम को हटाकर उसे शिक्षा का लाभ दिलाया जाये ।
गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के सेवायोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जायेगा।
  • पुनर्वास
बाल श्रमिक के परिवार के एक वयस्क सदस्य को रोजगार दिलाया जाये।
  • कल्याण निधि का गठन।
नियोजकों से वसूल की गयी उक्त धनराशि से प्रत्येक जिले में एक श्रम कल्याण निधि का गठन किया जाये, जिसका उपयोग बाल श्रमिकों के कल्याण हेतु किया जाये।

उपरोक्त प्रावधानों के बाद भी अनेक निषिद्ध उद्योगों और प्रक्रियाओं में बाल श्रम  का उपयोग किया जा रहा है। लोग देख कर भी उस की अनदेखी करते हैं।  इस का एक मुख्य कारण यह भी है कि हमारे यहाँ अभी लोगों को शिकायत करने की आदत नहीं है।  शिकायत कर देने पर भी उचित कार्यवाही करने वाले निरीक्षकों की बहुत कमी है, जो हैं उन्हें भी ऐसे नियोजको द्वारा प्रायोजित कर लिया जाता है।  जब तक स्वयं जनता में बाल श्रम विरोधी जागरूकता उत्पन्न नहीं होती है, बाल-श्रम का पूरी तरह से उन्मूलन संभव नहीं है।

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Tuesday 16 June 2009

बाल श्रम उन्मूलन पर एक लघु परिचर्चा

देश भर में बाल श्रम उन्मूलन सप्ताह मनाया जा रहा है।  इस संबंध में राष्ट्रीय विधिक प्राधिकरण द्वारा सभी जिला विधिक प्राधिकरण को एक परिपत्र जारी कर इस सप्ताह में बाल श्रम उन्मूलन के विचार को अधिक से अधिक प्रचारित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है।  इन्हीं निर्देशों के अंतर्गत आज श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण कोटा में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। जिस में अधिवक्ताओं और श्रमिक-नियोजक प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 

इस अवसर पर बोलते हुए कोटा की श्रम न्यायाधीश श्रीमती अनुराधा शर्मा ने कहा कि बालश्रम दोहन की मात्रा किसी भी समाज के पिछड़ेपन का पैमाना है।  जिस समाज में जितना अधिक बालश्रम दोहन होगा उतना ही वह समाज पिछड़ा रहेगा।  बालश्रम से मुक्ति प्राप्त किए बिना भारत अपने पिछड़ेपन से मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता।  समाज विकास का वह स्तर प्राप्त करना हमारा लक्ष्य होना चाहिए जिस में बालकों से किसी भी प्रकार का श्रम नहीं लिया जाए।

इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता और नियोजक प्रतिनिधि श्री एम.के.शर्मा ने कहा कि अधिकांश बाल श्रम का उपयोग छोटे और कुटीर उद्योगों, दुकानों तथा घरों में होता है। बालश्रम के उन्मूलन के लिए जन-जाग्रति की आवश्यकता है जिसे विद्यालयों के विद्यार्थियों के माध्यम से घर-घर पहुँचाया जा सकता है।  हिन्द मजदूर सभा राजस्थान के संयुक्त मंत्री और श्रमिक प्रतिनिधि श्री नरेन्द्र तिवारी ने कहा कि उन का संगठन बाल श्रम उन्मूलन के लिए लगातार प्रयासरत है तथा कस्बों और गावों में श्रमिक परिवारों में यह चेतना पहुंचाने का कार्य कर रहा है कि वे अपने बालकों से बिलकुल श्रम नहीं कराएँ और उन्हें विद्यालयों में भेजें।  उन के इन प्रयासों के सकारात्मक नतीजे भी सामने आए हैं और श्रमिक अब अपने बालकों को विद्यालयों में भेजने लगे हैं।
 
अधिवक्ता दिनेशराय द्विवेदी ने कहा कि बालश्रम समाज को अनेक प्रकार से हानि पहुँचाता है। बालकों का श्रम उन के स्वयं के विकास में ही उपयोग में लिया जाना चाहिए।  बालश्रम का दोहन बालकों के स्वाभाविक विकास में बाधक बनता है।  बाल श्रम सस्ता होने से उस के उपयोग से वयस्क बेरोजगारी में वृद्धि होती है। इसे रोका जाना आवश्यक है।  जिन परिवारों में 14 वर्ष की उम्र में काम पर जाना बालकों की मजबूरी है उन मामलों में बाल श्रमिकों के काम के घंटे 4 प्रतिदिन से अधिक नहीं होने चाहिए। इस संबंध में केन्द्र सरकार के सहयोग से बाल श्रमिकों के लिए चलाए जा रहे विद्यालयों ने बहुत जाग्रति पैदा की है और काम पर जाने वाले बालकों के अध्ययन की व्यवस्था हो सकी है। इस परिचर्चा में रामावतार जोशी, नन्दलाल शर्मा, रमेशचन्द्र नायक व अन्य अधिवक्ताओं व श्रमिक-नियोजक प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। परिचर्चा का संचालन अधिवक्ता रामस्वरूप शर्मा ने किया।

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Monday 15 June 2009

सरकारों की कुम्भकर्णी निद्रा तोड़ने के लिए शीघ् न्याय को राजनैतिक मुद्दा बनाना होगा

पिछले आलेख मुख्य न्यायाधीश ने कहा-अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि आवश्यक में तिरुनेलवेल्ली में हुए एक कार्यक्रम में जो कुछ कहा गया था उस की रिपोर्टिंग थी, जिस में मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि आबादी के हिसाब से अदालतों की स्थापना नहीं हुई और अदालतें पाँच गुना होना चाहिए।  इस पर कुछ पाठकों की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ इस प्रकार थीं...
  • इस पर तुरंत अमल करनें की जरूरत है ,वरना बहुत देर हो जायेगा।
  • कार्यप्रणाली की गुणवत्ता सुधार जरूरी है।
  • केवल न्यायपालिका का आकर बढ़ाना ही एकमात्र उपाय नहीं है. न्यायप्रणाली में भी आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
न्यायिक सुधारों को लागू करने के समय की बात है तो पहले ही बहुत देर हो चुकी है और समूचा ढांचा ही चरमरा रहा है, बस गिरने भर की देर है। और देऱी होने के बाद उस में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं रह जाएगी।  कार्यप्रणाली में गुणवत्ता बहुत गिरी है। उस का कारण भी अदालतों पर पाँच गुना भार ही है। मुकदमों के निपटारे में अनेक बार तो जजों को ध्यान देने तक का अवकाश नहीं होता।  एक बार में एक ही काम के स्थान पर उन्हें अनेक काम करने पड़ रहे हैं।  वे एक साथ बहस भी सुनते हैं, गवाहों की गवाहियां भी रिकॉर्ड करते हैं। बहस सुनने के उपरांत उन्हें निर्णय भी करने पड़ते हैं। उस के लिए उन्हें पढ़ने का पर्याप्त समय नहीं है।  अदालतें अपनी क्षमता से कम से कम दुगनी गति से काम कर रही हैं।  इस सब का असर भी गुणवत्ता पर पड़ रहा है। 


जहाँ तक आधुनिक पद्यतियों के उपयोग का प्रश्न है, जितने साधन उन्हें मुहैया कराए गए हैं उन का उपयोग हो रहा है।  सरकार अदालतों को साधन उपलब्ध कराने में बहुत कृपण है।  राज्य के श्रम मंत्रालय के अधीन चल रहे श्रम विभाग के कोटा  कार्यालय में कम्प्यूटर है, फैक्स सुविधा है।  उन का उपयोग राजकीय कार्यों के अतिरिक्त वैयक्तिक कार्यों में भी कम नहीं होता। लेकिन उसी मंत्रालय के अंतर्गत चल रहे श्रम न्यायालय में एक दो टाइप की मशीनें हैं जो 1979 में खरीदी गई थीं। दोनों बहुत जर्जर हालत में हैं।  मिस्त्री कह चुके हैं कि अब इन्हें दुरुस्त करना असंभव होता जा रहा है।  न्यायालय करीब दस वर्षों से कम्प्यूटर की मांग करता चला आ रहा है,  जिस से निर्णय लिखाने में सुविधा हो।  लेकिन यह मांग बजट के अभाव का कारण बता कर हर बार पूरी नहीं की जाती है।  अदालत जैसे तैसे उन्हीं टाइप मशीनों से काम चला रही है। यह तब है जब राजस्थान के सब श्रम न्यायालयों से अधिक काम कोटा के न्यायालय में है जहाँ चार हजार से अधिक मुकदमे लम्बित हैं। अन्य न्यायालय जो इस के बाद स्थापित हुए हैं वहाँ स्थापना के बजट से कंप्यूटर स्थापित किए गए अनेक वर्ष हो गए हैं। लेकिन सब से अधिक बोझ से दबी इस अदालत की आवाज राज्य सरकार को सुनाई नहीं दे रही है। इस तरह सब स्थानों पर न्यायपालिका कुपोषण की शिकार है, जिस के लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं। 


आमूल चूल परिवर्तन की भी तभी संभव है जब कि  प्रक्रिया संबंधी बहुत से कानूनों और नियमों को बदला जाए।  इन दोनों कामों को भी संसद, विधायिका और सरकारों को करना है।  इस मामले पर भी मुख्य न्यायाधीश अनेक बार बोल चुके हैं।  इस बार तो उन्हें परोक्ष रूप से यह भी कहना पड़ा कि राज्य सरकारों को उन की जिम्मेदारी निभाने के लिए बाध्य करने के लिए जनता को उन पर राजनैतिक दबाव बनाना पड़ेगा।  इसलिए जब तक शीघ्र न्याय  एक राजनैतिक मुद्दा नहीं बनता, तब तक शायद राज्य सरकारों की कुम्भकर्णी निद्रा नहीं टूटेगी। 
छाया-सुनील दीपक


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Saturday 13 June 2009

मुख्य न्यायाधीश ने कहा-अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि आवश्यक

अब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश  और मध्यस्थता व संराधन परियोजना के प्रधान श्री एस.बी. सिन्हा ने पिछले शनिवार को  कहा कि देश की अदालतों में मुकदमों का अम्बार एक दैत्याकार समस्या हो चुकी है।  तीन करोड़ मुकदमे अदालतों में समाधान के लिए लंबित हैं। मुकदमों के निर्णयों में हो रहे अत्यधिक विलम्ब के कारण लोग शर्म के मारे अदालतों में अपनी समस्याओं का समाधान प्राप्त करने से बचने लगे हैं। वे तिरुनेलवेली में न्यायिक अधिकारियों के एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम में समानान्तर विधि समस्या समाधान तंत्र पर बोल रहे थे।   उन्हों ने कहा कि हमें कानून और संवेधानिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए और  प्रत्येक व्यक्ति को न्याय प्रदान करने को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए।

उन्हों ने कहा कि 2008 में अदालतों में तीन करोड़ मुकदमे लम्बित हैं और वर्तमान स्थिति के चलते उन की संख्या 2030 तक 24 करोड़ हो जाएगी।  उन्हों ने कहा कि न्यायिक सुधारों की जिम्मेदारी सांसदों और विधायकों की है। जहाँ संरचनात्मक सुधारों के लिए कानूनों में संशोधनों की जरूरत है वहीं उन्हें लागू करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को अपना मानस परिवर्तित करने की आवश्यकता है।

मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन ने कहा कि इस मामले में समस्या यह है कि जिला स्तर तक की और अधिक अदालतें स्थापित करने के लिए वित्तीय भार उठाने हेतु पहल करने का दायित्व संबंधित राज्य सरकारों का है, जब कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालयों का दायित्व केन्द्र सरकार पर है। अधिकतर राज्य सरकारें जिला स्तर तक के न्यायालयों की संख्या में वृद्धि के लिए साधन जुटाने में कृपणता करती हैं। यदि न्याय पालिका की मजबूती के लिए कुछ सार्थक करना है तो राजनैतिक इच्छा की कमजोरी को जनता के समक्ष उजागर करना होगा।  यह समझा जा सकता है कि रातों-रात हजारों अदालतें नहीं खोली जा सकतीं।  लेकिन राज्य सरकारों को इस मामले में समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करने होंगे।

मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका के वर्तमान परिदृश्य पर कहा कि  हमारी न्यायपालिका 16685 अधीनस्थ अदालतों 886 उच्च-न्यायालय जजों और 31 सर्वोच्च न्यायालय जजों से निर्मित है।  समस्या यह है कि सभी स्तरों पर पुराने मुकदमे बड़ी संख्या में लंबित हैं। शिक्षा में प्रगति, सामाजिक-आर्थिक प्रगति और कानूनी अधिकारों के प्रति बेहतर जागरूकता के कारण अदालतों में बहुत मुकदमे आने लगे हैं।  यह इस के बावजूद है कि अभी तक गरीबी, अशिक्षा, जागरूकता के अभाव और सामाजिक भेदभाव के कारण बहुत लोग न्यायालयों तक पहुँच ही नहीं पाते हैं। वास्तविकता यह है कि जनसंख्या वृद्धि के साथ साथ न्यायपालिका के आकार को नहीं बढ़ाया गया।  जब कि विधि आयोग यह बता चुका है कि भारतीय न्याय पालिका को विकसित देशों के समकक्ष बनाने के लिए अधीनस्थ न्यायालयों की संख्या में पाँच गुना वृद्धि आवश्यक है।

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Thursday 11 June 2009

आज नहीं कल जमीनी हकीकत तो समझनी ही होगी

हमारी वकील बिरादरी में दो कहावतें मशहूर हैं कि वकील को बिना फीस अपने पिता को भी सलाह नहीं देना चाहिए और बिना मांगे सलाह देने वाला वकील मूर्खों का सरताज है।  मैं इन कहावतों की कल तक उपेक्षा करता रहा।  लेकिन आज लगता है कि वर्षों से जो कहावतें वकीलों के बीच प्रचलित हैं वे अवश्य ही कई पीढ़ियों के अनुभव का निचोड़ रही होंगी।   जब से मैं हिन्दी ब्लाग जगत का भाग बना हूँ, इसे एक परिवार माना है। वैचारिक मतभेद तो परिवार में पिता-पुत्र में भी होते हैं और भाई-भाई के बीच भी।  यही सोच कर अपने परिवार के एक सदस्य को विनम्रता पूर्वक एक सलाह दी।  भाई ने सलाह को माना भी।  लेकिन लोग यह समझाने में लगे हैं कि यह सलाह नहीं थी अपितु धमकी थी।  सारी स्वतंत्रताओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है। विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता पर पाबंदी प्रत्यक्ष रूप से बहुत लोगों ने नहीं देखी होगी,  लेकिन हम ने 1975 से 1977  तक उसे भोगा भी है। 

पिछले दो दिनों में एक बात और समझ में आई कि ब्लाग जगत की स्मृति की आयु बहुत क्षीण है। कभी-कभी वह केवल मात्र सप्ताह भर की अथवा दो या तीन दिन की होती है।  अभी डी-अजित के मामले को हुए चार माह भी पूरे नहीं हुए हैं,  जिस पर सारा ब्लाग जगत हलकान हुआ जा रहा था।  केरल के 19 वर्षीय विद्यार्थी डी-अजित के विरुद्ध उन के द्वारा ऑर्कुट पर स्थापित कम्युनिटी पर आई टिप्पणी के लिए महाराष्ट्र में एक मुकदमा दर्ज कराया गया।  उन्हें केरल उच्चन्यायालय से अंतरिम जमानत करानी पड़ी। वे उस मुकदमे में प्रथम सूचना रिपोर्ट को खारिज कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहुँचे। जहाँ उन की याचिका अस्वीकार कर दी गई और उन्हें कहा गया कि उन्हें महाराष्ट्र उच्चन्यायालय में ही जा कर ऐसी याचिका प्रस्तुत करना चाहिए। आगे क्या हुआ यह पता नहीं।  मुझ से इस मामले पर एक आलेख लिखने को कहा गया था। वह जनादेश पर प्रकाशित हुआ।  सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि डी-अजित कम्प्यूटर विज्ञान के विद्यार्थी हैं कोई बालक नहीं।  उन्हें जानना चाहिए कि जो कुछ वे कर रहे हैं वह देश के कानून के मुताबिक है या नहीं।  आगे डी-अजित के मुकदमे का क्या हुआ यह अभी पता नहीं। लेकिन केरल हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट फिर बोम्बे हाइकोर्ट तक का सफर तो उन का पता है।  कैसे उन्हों ने यह सफर किया होगा? कैसे एक विद्यार्थी ने इन तीन अदालतों का खर्च जुटाया होगा? इस अदालती भागदौड़ में उन के अध्ययन का क्या हुआ होगा? और इस से भी आगे उन के भविष्य के कैरियर का क्या होगा? इन सब का केवल अनुमान किया जा सकता है।  वैसे अन्तर्जाल पर प्रकाशित कृतियों की जिम्मेदारी के विषय में नए कानून भी बने हैं। आप चाहें तो नीचे के चित्र पर क्लिक कर उस की एक बानगी देख सकते हैं।



कोई कहीं भी लिखे, अखबार में, किताब में या फिर किसी अंतर्जाल पर प्रकट किए गए शब्दों का मूल्य कानून की दृष्टि में भिन्न नहीं है। उसी समय ब्लाग जगत का सामान्य मानस यह बना कि अपने विचारों को ऐसी भाषा में लिखना चाहिए जिस से वे किसी कानून की जद में न आएँ।  डी-अजित को उन के खुद के लिखे के कारण यह सब नहीं भुगतना पड़ा था अपितु उन के द्वारा स्थापित कम्युनिटी पर आई एक टिप्पणी उस का कारण  थी। क्यों कि टिप्पणी उन की खुद की साइट पर प्रकाशित हुई थी, वे प्रकाशक थे।  कानून प्रकाशक पर भी उतनी ही जिम्मेदारी डालता है जितनी कि कृतिकार पर।  इस कारण यह मानस भी बना कि टिप्पणियों पर भी मॉडरेशन होना चाहिए। जिस से उन के प्रकाशन का नियंत्रण प्रकाशक ब्लागर के स्वयं के हाथ रहे।  उसी समय अनेक ब्लागरों ने अपने ब्लाग पर यह व्यवस्था लागू भी कर दी।  मैं स्वयं इस दम्भ में रहा कि मेरे ब्लागों पर ऐसी कोई टिप्पणी हो ही नहीं सकती।  लेकिन पिछले दो दिनों ने मेरे इस दम्भ को तोड़ दिया।  नतीजा यह हुआ कि मुझे कुछ प्रकाशित टिप्पणियों को हटाना पड़ा और उन पर मॉडरेशन आरंभ करना पड़ा।

एक ब्लागर जो आम इंसान है वह ब्लागिंग से आई मुसीबतों का सामना करने पर टूट सकता है। इस तथ्य को हम सभी जानते हैं, भले ही इसे स्वीकार करें या न करें।  जिस तरह मेरी सलाह को धमकी मान कर दी गई प्रतिक्रियाओं में कहा गया है और कहा जा रहा है कि जो कुछ कहा जा चुका है उस पर ड़टे रहना चाहिए। वह भी कहा जा सकता है। यदि लेखक केवल ब्लागर न हो कर एक मिशन का सदस्य हो। क्यों कि मिशन का सदस्य तो सब कुछ अपने मिशन पर कुर्बान करने का साहस  रखता है।  वह अपना शीश तक अर्पण कर सकता है।  भगत सिंह ने अपने आप को स्वैच्छा से ही कुर्बान किया था।  यदि ऐसा है तो निश्चित रुप से मेरी सलाह को धमकी के बतौर ही लिया जाना चाहिए।  मैं ने अपनी सलाह का निवेदन एक बेहद निजि ई-मेल के द्वारा किया था। कोई जरूरी नहीं था कि उस निवेदन को स्वीकार किया ही जाता।   लेकिन उसे निवेदन समझ कर स्वीकार किया गया।   हर व्यक्ति समाज में अपनी भूमिका अपनी समझ के अनुसार अदा करता है।  आज किसी की भूमिका को गलत और सही नहीं ठहराया जा सकता।  इस का निर्णय तो आने वाला वक्त करेगा।  लेकिन भावनात्मक आवेश में आ कर अपने ही जीवन में काँटे बिछा लेना और अपने लक्ष्य की राह में रोड़े खड़े करने को कोई भी बुद्धिमानी नहीं कह सकता।   आज नहीं कल जमीनी हकीकत तो समझनी ही होगी।

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Tuesday 9 June 2009

नए व्यक्तियों का वकालत के पेशे में प्रवेश और चुनौतियाँ : वकील और कानून-व्यवस्था (3)

कानून की डिग्री हासिल कर बार कौंसिल में अपना पंजीयन कराते ही एक व्यक्ति वकालत करने का अधिकार प्राप्त कर लेता है।  लेकिन वकालत के व्यवसाय में पैर जमा पाना इतना आसान नहीं।  कानूनन किसी वरिष्ठ वकील के पास ट्रेनिंग जरूरी न होते हुए भी एक नए वकील को जल्दी ही यह पता लग जाता है कि उस के पास के ज्ञान के भरोसे वकालत कर पाना संभव नहीं है, उसे जल्दी ही किसी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में स्थान बनाना पड़ता है।  कोई भी वरिष्ठ वकील अपने कार्यालय में नए वकील को सहज स्वीकार नहीं करता क्यों कि इस तरह वह अपने ही कार्यालय में अपने ही एक प्रतिस्पर्धी को स्थान दे रहा होता है।  लेकिन हर वरिष्ठ वकील को भी जिस के कार्यालय में पर्याप्त काम है, अपनी सहायता के लिए हमेशा ही कुछ सहयोगी वकीलों की जरूरत होती है। यही जरूरत नए वकीलों के वरिष्ठ वकीलों के कार्यालयों में प्रवेश को सुगम बनाती है।  नए वकील को किसी भी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में पहले छह माह तक न तो कोई काम मिलता है और न ही कोई आर्थिक सहायता।  इस काल में वह केवल कार्यालय और अदालत में अपने वरिष्ठ वकील के काम का निरीक्षण कर सीखता है और खुद को इस काबिल बनाता है कि वह वरिष्ठ वकील के काम में कुछ सहायता करे।  इस बीच उसे केवल वही काम करने को मिलते हैं जो एक वरिष्ठ वकील का  लिपिक (मुंशी)  करता है।  इस बीच वह अपने वरिष्ठ वकील का अनुसरण करते हुए काम करना सीखता है और उस की पहचान बनने लगती है।   छह माह में उसे अदालत के न्यायाधीश, लिपिक, अन्य वकील, उन के मुंशी और वरिष्ठ वकील के मुवक्किल उसे नए वकील के रूप में पहचानने लगते हैं। इस बीच वह जितना काम करने के लायक हो जाता है उतनी ही आर्थिक सहायता उसे वरिष्ठ वकील के माध्यम से प्राप्त होने लगती है जो अक्सर अनिश्चित होती है।

उच्च माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करते करते किसी भी युवक की उम्र 17-18 वर्ष हो जाती है। उस के बाद तीन वर्ष स्नातक बनने में और तीन वर्ष विधि-स्नातक बनने में कुल 23-24 वर्ष की आयु का होने पर ही कोई व्यक्ति वकालत के व्यवसाय में पैर रखता है। यह वह उम्र है जब वह विवाह कर चुका होता है या करने वाला होता है।  उसे अपने भावी जीवन की चिंता सताने लगती है।  इस उम्र में आते-आते उस पर यह दबाव बन जाता है कि वह अपने परिवार (पत्नी और बच्चे) को चलाने के लायक आमदनी अवश्य करने लगे।  यह दबाव ही एक नए वकील को शीघ्र कमाने लायक बनने को प्रेरित करती है।  अगले छह माह के दौरान वह यह पता लगाने का प्रयत्न करता है कि शीघ्र कमाई के साधन क्या हो सकते हैं। नए वकीलों में पाँच प्रतिशत ऐसे व्यक्ति भी होते हैं। जो सुदृढ़ आर्थिक स्थिति आते हैं या जिन के पास कोई अन्य आय का साधन होता है। इन में वे वकील भी सम्मिलित हैं जिन के पिता या परिवार का कोई सदस्य पहले से वकालत के व्यवसाय में होता है। इस श्रेणी के वकीलों पर कमाई का दबाव नहीं होता है।  वे आराम से अपना अभ्यास जारी रखते हैं। उन की कमाई धीरे धीरे आरंभ होती है।  उन का काम भी अच्छा होता है और वे विश्वसनीय वकील साबित होते हैं। 

शेष लोग जिन पर कमाई का दबाव होता है।  उन में से अधिकांश शीघ्र कमाई का जुगाड़ करने के चक्कर में छोटे-छोटे काम करने लगते हैं और जल्दी ही वरिष्ठ वकील के कार्यालय से पृथक अपना अस्तित्व कायम कर लेते हैं।  लेकिन उन का अभ्यास कमजोर रह जाता है।  वे जो भी काम मिलने का अवसर उन्हें मिलता है उसे नहीं छोड़ते, चाहे उस काम को करने में वे स्वयं सक्षम हों या नहीं।  वे ऐसे कामों को करने में बहुधा ही त्रुटियाँ करते हैं जो कभी बहुत गंभीर होती हैं और जिन्हें किसी भी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है।  ऐसे वकील अक्सर मुवक्किल के लिए खतरा-ए-जान सिद्ध होते हैं।  जल्दी ही मुवक्किल को पता लग जाता है कि वह गलत स्थान पर फंस गया है।  वह वहाँ से जान छुड़ाने की कोशिश करता है। अक्सर ही उसे अपनी अदा की जा चुकी वकील फीस का मोह त्याग कर अपने मुकदमे को किसी काबिल वकील को देना पड़ता है।  किसी भी काबिल वकील के लिए ऐसा मुकदमा लेना आसान नहीं होता।  पहली अड़चन वह नियम है जिस के अंतर्गत  किसी भी मुकदमे में कोई भी वकील पूर्व में नियुक्त किए गए वकील की अनुमति के बिना अपना वकालत नामा प्रस्तुत नहीं कर सकता जब तक कि न्यायालय स्वयं ही परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस की अनुमति न दे दे।  इस कारण से दूसरा वकील नियुक्त करने के पहले किसी भी शर्त पर मुवक्किल को पहले वाले वकील से नए वकील के लिए अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है।  जो काबिल वकील इस तरह बिगड़े पुराना लेना स्वीकार करता है, वह पहले यह देख लेता है कि जो नुकसान उस के मुवक्किल को हो चुका है उस में से कितना सुधारना संभव है? और वह यह बात अवश्य ही अपने मुवक्किल को बता भी देता है।  इस तरह के बिगड़े हुए मुकदमों में काबिल वकील को अतिरिक्त श्रम करना होता है।  इसी कारण से वह अपनी शुल्क भी अधिक ही लेता है। (क्रमशः)

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Monday 8 June 2009

वकालत के पेशे में आने वाले लोग : वकील और कानून-व्यवस्था (2)

वकील एक पेशेवर (professional) समुदाय तो है,  लेकिन उन्हें आर्थिक एक वर्ग नहीं कहा जा सकता।  वकीलों में ऐसे लोग मिलेंगे जो देश के सब से बड़े व्यक्तिगत आयकर दाता रहे हैं और ऐसे भी जो आयकर देना तो छोड़ सारे जीवन आयकर सीमा को छूने का प्रयत्न करते रहते हैं लेकिन उसे कभी छू नहीं पाते।  जिन पेशों को तीन दशक पहले सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनमें वकालत, चिकित्सा, इंजिनियरिंग, अध्यापन आदि सम्मिलित थे। लेकिन चिकित्सा, इंजिनियरिंग, अध्यापन जैसे पेशों में पेशेवर अध्ययन के लिए प्रवेश परीक्षा आरंभ हो गई।  लेकिन वकालत के पेशे के लिए इस तरह की कोई रुकावट नहीं रही।  नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत लोगों ने विधि-स्नातक होना एक मार्ग के रुप में चुना।  पहले इस पेशे में आने के लिए किसी वरिष्ठ वकील के पास प्रशिक्षण लेना और इस का प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य था।  इस से कम से कम एक वर्ष किसी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में रह कर एक व्यक्ति इस पेशे से संबंधित आचार की शिक्षा प्राप्त करता था और बहुत से परंपरागत गुण सीखता था। लेकिन जब से विधि की प्रोफेशनल डिग्री का प्रचलन हुआ। यह अनिवार्यता समाप्त हो गई और विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत कोई भी बार काऊंसिल में अपना पंजीकरण करवा कर सीधे वकालत आरंभ कर सकता है।  इस का नतीजा यह हुआ कि वकालत के पेशे में पेशेवर आचार-संहिता के ज्ञान और अभ्यास से हीन व्यक्तियों का प्रवेश संभव हो गया। आज इस पेशे में इस तरह के लोगों की संख्या अस्सी प्रतिशत से कम नहीं है।

वकीलों के लिए जो तीन वर्षीय पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों ने तय किया है, उस में पेशेवर आचार संहिता की पढ़ाई शामिल नहीं है।  वकीलों को किस तरह की यूनिफॉर्म पहननी चाहिए और उस का महत्व क्या है? यह तक उस में शामिल नहीं है।  इस की जानकारी वह या तो पुराने वकीलों से पूछ कर करता है या उसे बार काऊंसिल नियम पढ़ने से यह जानकारी हो पाती है।  वकीलों का उन के मुवक्किलों के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए? उन्हें मुवक्किलों के धन का किस तरह हिसाब रखना चाहिए? उन का न्यायालय में क्या व्यवहार होना चाहिए? यहाँ तक कि एक न्यायालय में उन की स्थिति न्यायालय के एक अधिकारी की है, इस का तक ज्ञान नहीं होता है।  वकील का काम किसी मुवक्किल की विधि से संबंधित समस्या के हल के लिए सुझाव देना और उसे कार्यरूप में परिणत कर उस की समस्या के हल के लिए आगे बढ़ना है।  जब भी कोई मुवक्किल किसी वकील से संपर्क कर अपनी समस्या सामने रखता है, तो सब से पहला काम वकील का यह है कि उस समस्या के हल के लिए उचित उपाय खोजे, अपनी परियोजना मुवक्किल को सुझाए।  मुवक्किल द्वारा सहमति दे देने पर उस परियोजना पर काम करे।  इस के लिए यह आवश्यक है कि किसी वकील को विधिक उपायों की जानकारी हो।  जब मैं वकालत का अध्ययन कर रहा था तब विधि के पाठ्यक्रम में एक विषय विधिक उपायों का भी होता था।  अभी हाल में जब कोटा विश्वविद्यालय बनने के बाद जब वहाँ विधि पाठ्यक्रम बनाया गया तो पता लगा उन में विधिक उपायों का कोई विषय है ही नहीं। अधिकांश विश्वविद्यालयों से यह विषय पाठ्यक्रम से नदारद है।  ऐसे में एक नया वकील विधिक उपायों को अभ्यास से सीखता है।  प्रारंभ में वह अनेक मुवक्किलों को गलत उपायों के मार्ग पर डाल देता है।  उस का हाल उस कहावत जैसा है, "सीखे बेटा नाऊ को, मूँड मुढ़े काहू को"।  किसी का भी सर कटे या गाल नाई का बेटा तो हजामत बनाना सीख ही जाता है।

वकालत के इस पेशे में नए और जवान लोग ही आते हों ऐसा नहीं है।  बहुत सारे लोग जो विधि-स्नातक उपाधि लेने के उपरांत विभिन्न नौकरियों में चले जाते हैं। अनेक ऐसे हैं जो नौकरियों के दौरान विधि-स्नातक उपाधि हासिल कर लेते हैं।  पचपन और साठ वर्ष की उम्र में वे वकालत में अपना हाथ आजमाने के लिए प्रवेश करते हैं।  ऐसे लोगों की भी इस व्यवसाय में कमी नहीं है।  इन में से बहुत लोग तो सरकारी नौकरशाही के सारे करतब सीख कर आते हैं।  मुझे इस बात को कहने में कोई शर्म  नहीं कि इस स्रोत से आने वाले अधिकांश लोग रिश्वत लेने और देने की कला में निष्णात हो कर आते हैं और अपनी इस कला के जौहर आते ही दिखाने लगते हैं।  ऐसे लोगों ने न्यापालिका में भ्रष्टाचार के प्रवेश और उस के विकास में भरपूर योगदान किया है।  बार काऊंसिल ने इस तरह के प्रवेशों को रोकने के लिए एक नियम बनाया था कि जिन लोगों की आयु 45 वर्ष से अधिक की है उन का पंजीयन नहीं किया जाएगा।  इस नए नियम पर अदालत ने ही रोक लगा दी।  वकालत के पेशे को संक्रमणों से बचाने को जितने भी उपाय बार कौंसिलों ने किए वे इसी तरह असफल होते गए हैं।  इस का नतीजा है कि वकालत में आने वाले लोग वैसे ही इस पेशे में प्रवेश कर रहे हैं जैसे बरसात के पानी को नदी से सीधे बिना फिल्टर किए आप के घरों में पीने के लिए भेज दिया हो।  अब पानी को छान कर और स्वास्थ्यकर बनाने की जिम्मेदारी भी उसी पर आ गई है जो उसे पीना चाहता है।

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Sunday 7 June 2009

वकील और कानून-व्यवस्था (1)

अदालत ब्लाग पर खबर थी कि 4 जून को  दिल्ली में जिला न्यायालयों के वकील हड़ताल पर रहे।  हड़ताल की वजह अदालत परिसर में वकीलों की सुरक्षा की समुचित व्यवस्था की मांग थी।  हुआ यह था कि अदालत परिसर से कुछ लोगों ने एक वकील का अपहरण कर लिया था।  बाद में पता लगा कि वह उन का लक्ष्य नहीं था, उसे छोड़ भी दिया गया। वकीलों का कहना है कि अदालत परिसर में हर तरह के लोग आते हैं, उनमें बहुत से अपराधी भी होते हैं। पिछले कुछ दिनों से वकीलों के खिलाफ हिंसा के मामले बढ़े हैं।  इसका कारण समुचित सुरक्षा का अभाव है।  सुरक्षा कारणों से कई बार वकील अदालतों में हाजिर नहीं हो पाते और अदालत में सूचीबद्ध मामलों की सुनवाई स्थगित हो जाती है।
इस खबर से मामले की गंभीरता का अनुमान हो सकता है कि, एक समय सम्मानीय माना जाने वाला यह पेशा किन हालात को पहुँच गया है।  वकालत के पेशे  की ऊँचाई और गिरावट सीधे-सीधे न्याय व्यवस्था से नाभिनाल बद्ध है।  देश में अदालतों की संख्या में कमी के चलते यह हालत हो गई है कि एक प्लाईवुड विक्रेता ने अदालतों में मुकदमों के निर्णयों में होने वाली देऱी को अपने उत्पाद को बेचने के लिए विज्ञापन का साधन बना डाला है। जिस का उल्लेख आज अनिल पुसदकर जी ने अपने ब्लाग अमीर धरती गरीब लोग में अपने लघु आलेख प्लाईवुड बेचने वाले मज़ाक उड़ा रहे है न्यायपालिका का? में किया है।
प्लाईवुड कंपनी का यह विज्ञापन हमारी न्याय-व्यवस्था की हालत को ठीक से प्रदर्शित करता है।  हालत यह हो गई है कि दसियों वर्षों तक अपराधियों को सजाएं नहीं मिलती।  साक्ष्य में देरी के कारण गवाहों को तलाश करना दुर्लभ हो जाता है। जो मिल जाते हैं उन की स्मृति घटना के संबंध में मंद हो़ जाती है जिस का नतीजा होता है कि अपराधी सजा से बच जाते हैं।  अपराध करने वाले लोग जमानतों पर बरसों आजाद रहते हैं और गवाहों पर गवाही न देने के लिए दबाव डालते हैं।  इस से अपराधिक गतिविधियाँ और बढ़ती हैं।  धीरे-धीरे भारतीय समाज में अपराधियों का दबदबा बढ़ता जा रहा है।  वे बड़ी संख्या में संसद और विधानसभाओं में पहुँचते हैं। वहाँ जो साफ सुथरे दिखाई देते हैं उन में से भी अधिकांश के रिश्ते अपराधियों से जुड़े हैं। महाराष्ट्र के एनसीपी सांसद पद्म सिंह पाटिल की हत्या मामले में गिरफ्तारी इस का ताजा सबूत है। 
राज्यों में जिला स्तर तक की अदालतें स्थापित करने की जिम्मेदारी भी राज्य सरकारों की है तथा कानून और व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व भी उन्ही पर है। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने तथा अपराधों की रोकथाम और किए गए अपराधों के लिए अपराधियों को सजा दिलाने के लिए राज्यों के पास पुलिस बल है। लेकिन उस की हालत भी सभी राज्यों में दयनीय दिखाई देती है।  किसी थाने में कोई अपराध की सूचना ले कर जाए तो उस के साथ ऐसा व्यवहार होता है जैसे वह पुलिस के लिए कोई मुसीबत ले कर आया हो।  किसी अपराध की प्रथम सूचना ले कर पहुँचने वाला वस्तुतः राज्य के काम में सहयोग के लिए वहाँ पहुँचता है लेकिन वहाँ जिस तरीके से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के पूर्व ही उस के साथ जैसे व्यवहार किया जाता है उसे लगने लगता है जैसे सब से बड़ा अपराधी तो वह उस ने खुद है पुलिस थाने का रुख कर के किया है। रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती हैं। उन्हें इस बात की जाँच के लिए दे दिया जाता है कि, अपराध भी घटित हुआ है या नहीं।  यह जाँच दिनों नहीं, अपितु महिनों तक चलती रहती है।  तब तक परिवादी या तो थक कर घर बैठ जाता है या उसे किसी तरह डरा धमका कर बिठा दिया जाता है।  अधिक मुश्किल में होने पर वह अदालत का रास्ता देखता है। वास्तविकता है कि देश में जितने अपराध हो रहे हैं उन की आधे भी शायद ही पुलिस थानों में दर्ज हो रहे हैं। 
वकील पुलिस, अदालत, परिवादियों, अपराधियों, राजनेताओं के लगातार संपर्क में रहते हैं।  वे इन सब के चरित्र को अच्छी तरह समझते हैं और समझ सकते हैं।  लेकिन अन्य पेशेवर लोगों की तरह वे भी इन सब की अनदेखी कर अपनी रोजी-रोटी कमाने की फेर में पड़े रहते हैं।  लेकिन जब किसी वकील का अपहरण जैसी घटना हो जाए और वह भी किसी अन्य की गलतफहमी में तो यह उन की चिंता का विषय बनता है।  वे हड़ताल करते हैं।  लेकिन यह हड़ताल समस्या का इलाज नहीं है, अपितु व्यवस्था के प्रति वकील समुदाय के गुस्से का इजहार मात्र है।  वकीलों को सामुहिक रुप से एक पेशेवर समूह के तौर पर इस से कुछ आगे जा कर सोचना होगा। (क्रमशः)

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Thursday 4 June 2009

पहले चिकित्सा, फिर एफआईआर कराएँ -सुप्रीम कोर्ट

चिकित्सा में समय लगने के कारण प्राथमिकी में देरी अपराधी को सजा में बाधा नहीं


13 जनवरी 2000 को लोहड़ी का त्योहार था।  उस रात हिमाचल प्रदेश के मंडी कस्बे  एक घर में पार्टी चल रही थी।  यह घर आयकर कार्यालय के चौकीदार यशपाल का था।  इस पार्टी का आयोजन संजीव सेन ने किया था और इस में गणेश कौशल, संजीव राना और श्रवणकुमार शामिल थे।  यशपाल और उस की पत्नी मोहल्ला पड्डल में किसी समारोह में गए हुए थे और वे रात को 9.30 बजे लौटे।  यशपाल की पत्नी का स्वास्थ्य खराब था इस कारण से वह सोने चली गई।  इस बीच चारों दोस्त पार्टी करते रहे।  उन्हों ने एक बोतल शराब की खाली कर दी थी और कम आवाज में संगीत की धुन पर नाच रहे थे।  रात को 10.30 बजे राकेश कुमार ने दरवाजा खटखटाया और दरवाजा खोलने पर कहा कि उसे किसने आवाज दी? गणेश कौशल ने जवाब दिया कि किसी ने भी उसे आवाज नहीं दी। गणेश ने उसे कमरे से बाहर चले जाने को कहा।  कमरे से बाहर जाते हुए राकेश ने कहा कि तुम लोग समझ जाओ, नहीं तो मैं तुम्हारे सर धड़ से अलग कर दूंगा। 


राकेश के जाने के बाद गणेश ने दरवाजा अंदर से बंद कर दिया और सब नाचते रहे।  रात को 12-12.30 बजे के बीच संजीव सेन ने दरवाजा खोला और लघुशंका के लिए बाहर गया। जब वह बाहर निकला तो बाहर खड़े राकेश ने उस की छाती में चाकू से हमला किया।  बाकी लोगों ने राकेश को पकड़ने की कोशिश की लेकिन वह भाग निकला।  संजीव सेन की छाती से खून बह रहा था।  गणेश ने श्रवण को खून रोकने के लिए उस की छाती दबाने के लिए कहा और खुद पड़ौसी के घर से रुई लाया। उन्होने संजीव सेन का प्राथमिक उपचार किया। इस के बाद वे ऑटोरिक्शा तलाशने दौड़े। वे दोनों उसे मंडी के संजीवन अस्पताल ले गए लेकिन उस निजि अस्पताल में कोई डाक्टर उपलब्ध नहीं था। वे उसे लेकर मंडी के जोनल अस्पताल पहुँचे तो रात के 1.20 बज गए थे। उसे चिकित्सा दी गई लेकिन रात डेढ़ बजे संजीव सेन की मृत्यु हो गई।

इस के उपरांत संजीव सेन के मित्रों ने थाने जा कर प्राथमिकी दर्ज कराई।  संजीव सेन की हत्या करने के लिए राकेश पर मुकदमा चलाया गया। जिस में सबूतों के आधार पर उसे आजीवन कारावास और पाँच हजार रुपया जुर्माना, व जुर्माना न देने पर छह माह के कारावास की सजा सुनाई गई।  राकेश ने अपील की तो हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।  हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट के इस फैसले के विरुद्ध सु्प्रीम कोर्ट को अपील की।

हाई कोर्ट  राकेश को बरी करने के कुछ अन्य आधार भी बताए थे लेकिन एक आधार यह भी था कि मामले की प्राथमिकी थाने में घटना के बहुत देर बाद दर्ज कराई थी।  तर्क यह था कि राकेश को जानबूझ कर फंसाया गया, वह तो घटना के समय अन्यत्र मौजूद था।  जब श्रवण और गणेश संजीव सेन को अस्पताल ले जा रहे थे तो रास्ते में पुलिस थाना पड़ता था और वे आराम से प्राथमिकी दर्ज करा सकते थे।  यहाँ हिमाचल सरकार का कहना था कि जब मृतक घायल था तो मित्रों ने पहले उस की जान बचाने की कोशिश की और जब उन का प्रयास सफल न हो सका तो उन्हों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हाई कोर्ट के निर्णय को गंभीर रूप से गलत बताते हुए कहा कि स्वाभाविक बात है कि यदि कोई घायल है तो उसे पहले अस्पताल ही ले जा कर उस की जान बचाने की कोशिश की जाएगी और बाद में पुलिस थाने जाया जाएगा।  सुप्रीम कोर्ट ने दिनांक 06 मई 2009 को दिए अपने निर्णय में अभियुक्त को दोषी मानते हुए हाईकोर्ट का निर्णय रद्द कर दिया और सेशन न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और सजा को सही मानते हुए वापस बहाल कर दिया।

इस निर्णय से सुप्रीम कोर्ट ने यह स्थापित करने की कोशिश की है कि जब कोई अपराध घटित हो और उस में कोई घायल हो तो पहली आवश्यकता उस की चिकित्सा की है। चिकित्सा कराए जाने में समय लगने के कारण देरी से कराई गई प्राथमिकी किसी व्यक्ति को सजा देने में बाधा नहीं मानी जा सकती है।

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Wednesday 3 June 2009

अबू काज़मी पर महाराष्ट्र सरकार खजाना लुटा रही है?

अब्बास काज़मी को कसाब की पैरवी करने के लिए 2500.00 रुपए प्रतिदिन और 50,000.00 रुपए प्रतिमाह फीस के रूप में प्राप्त होंगे।   हमारे कुछ ब्लागर मित्रों को यह फीस अधिक प्रतीत होती है।   उन्हों ने यह लिखा कि महाराष्ट्र सरकार उन पर पैसा लुटा रही है। मैं कुछ तथ्य आप के सामने रख रहा हूँ।

अब्बास काज़मी मुम्बई के वरिष्ठ फौजदारी वकील हैं।  मैं खुद एक वकील होने के कारण यह जानता हूँ कि वकील के क्या दायित्व होते हैं?  उन्हें अदालत ने अज़मल आमिर कसाब का वकील नियुक्त किया है।  वे अदालत के अलावा किसी भी अन्य के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं।  अदालत को न्याय करने में मदद करना उन की जिम्मेदारी है। उन्हें जो जिम्मेदारी का काम मिला है उस में 1000 पृष्टों से अधिक का एक आरोप पत्र है जिस में कसाब पर  कुल 86 आरोप लगाए गए हैं।  इस तरह के मुकदमे में किसी पक्ष का वकील होना कोई मामूली काम नहीं है।  इस मुकदमे में पैरवी करते हुए उन पर सारी दुनिया की निगाहें हैं।  सारी दुनिया भर के अखबारों और दृष्य माध्यमों के संवाददाता उन के पीछे हैं।  उन का एक एक मिनट देखा परखा जा रहा है। अनेक जासूसी ऐजेंसियाँ और पुलिस उन की निगरानी कर रही होंगी।  वे अदालत और कानून द्वारा सौंपे गए महत्वपूर्ण दायित्व को निभा रहे हैं।

एक वकील जब साल भर में अपनी कमाई का हिसाब लगाता है तो उस की वास्तविक कमाई उसे मिलने वाली फीस की आधी से कुछ कम या कुछ ही अधिक होती है।  शेष आधी फीस में उस के अपने कर्मचारियों जिन में टाइपिस्ट, क्लर्क, चालक  आदि के वेतन, वाहन का खर्च, ऑफिस का खर्च, पुस्तकों, कम्प्यूटर, इंटरनेट व स्टेशनरी आदि का खर्च शामिल होता है।

यदि हम अनुमान लगाएँ तो अब्बास आज़मी को मात्र 25,000.00 रुपए प्रतिमाह इस काम के लिए मिलेंगे।  जब कि मुम्बई में एक क्लर्क का वेतन इस से अधिक है।    पर मेरी व्यक्तिगत मान्यता है कि अबू काज़मी को बहुत कम फीस दी जा रही है।  यह उन का बड़प्पन है कि उन्हों ने इस फीस में यह काम करना स्वीकार किया है।इस के बावजूद यदि यह कहा जा रहा है कि उन पर सरकार खजाना लुटा रही है तो भारतीय जनतंत्र में किसी को कुछ भी कहने की पूरी आजादी है,  कहता रहे। किसी की जुबान पकड़ी तो नहीं जा सकती।

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Tuesday 2 June 2009

कोई भी कृत्य उस से उत्पन्न विक्षोभ के कारण आत्महत्या कर लेने पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का अपराध है

वह 31 दिसंबर 1995 की रात थी।  अर्धरात्रि को एक नया वर्ष 1996 आरंभ होने को था। बितरा चाहता था कि वह रात वह अपनी पत्नी के साथ बिताएगा और नए वर्ष का स्वागत करेगा। लेकिन पत्नी शाम को ही कहीं चली गई थी। वह प्रतीक्षा करता रहा कि वह लौट कर आएगी। लेकिन रात ग्यारह बज चुके थे। उस ने उसे तलाश भी किया किंतु जहाँ जहाँ वह हो सकती थी वहाँ वह कहीं नहीं मिली। बितरा ने वह रात बैचेनी के साथ बिताई। अगले दिन पत्नी वापस लौट कर आ गई। दोनों के बीच झगड़ा हुआ कि वह बिना बताए वहाँ से क्यों चली गई थी। झगड़े ने बितरा के जीवन में कड़ुआहट भर दी थी। उसे लगा कि ऐसे किस तरह उस का जीवन चलेगा। उस ने पत्नी के पिता को बुलवा भेजा। ससुर आए तो उस ने पत्नी को उन के साथ भेज दिया कि वे पत्नी को समझाएँ कि वह अपना व्यवहार सुधारे। वे अपनी बेटी को साथ ले गए।

पत्नी को उस के पिता के साथ गए कुछ ही घंटे बीते होंगे कि श्रीनू वहाँ आया। उस ने बितरा से पूछा कि क्या उस की पत्नी घर पर है? बितरा अपनी पत्नी के व्यवहार से परेशान तो था ही श्रीनू के पूछने पर उस ने कहा कि उसे उस की पत्नी से क्या लेना देना है वह उस के घर न आया करे। वाद विवाद और चिल्ला कर बोलने की आवाज से पूरा घर और पड़ौस वहाँ इकट्ठा हो गया था। श्रीनू ने सब के सामने बितरा को स्पष्ट कह दिया कि वह वहाँ आने से न रुकेगा। बितरा की पत्नी उस की प्रेमिका है और जब तक वह खुद उसे मना नहीं करती तब तक वह यहाँ आता रहेगा। बितरा के घर वालों ने बताया कि बितरा की पत्नी उस के पिता के साथ गई है। यह सुन कर श्रीनू वहाँ से चला गया।  इस खुलासे से कि उस की पत्नी श्रीनू की प्रेमिका है और वह जबरन उस के घर में घुसने लगा है बितरा का मन खराब हो गया उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगा।

श्रीनू वहाँ से बितरा के ससुर के घर गया तो उसे पता लगा कि उस की प्रेमिका को उस के पिता ने उस के  भाई के घर रख छोड़ा है। वह वहाँ पहुँच गया और उसे अपने साथ चलने को कहा, वह श्रीनू के साथ जाने को तैयार हो गई। भाई ने अपनी बहिन के श्रीनू के साथ जाने का विरोध किया लेकिन वह उस के विरोध के बाद भी श्रीनू उस की बहिन को अपने साथ ले गया। बितरा की पत्नी श्रीनू के साथ चार दिन रही फिर बितरा के साथ रही। पाँचवे दिन श्रीनू उसे उस के भाई के घर छोड़ कर चला गया। भाई ने भी उसे अपने पास नहीं रखा और अपने पिता के घर छोड़ आया।

जब बितरा को पता लगा कि श्रीनू उस की पत्नी को उस के भाई के घर से साथ ले गया था और चार दिन साथ रख कर छो़ड़ गया है, तो बितरा ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया, वह गुमसुम हो गया। उसी रात उस ने फाँसी लगा कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। इस आत्महत्या की खबर पुलिस को की गई। पुलिस ने बितरा के शव का पोस्टमार्टम कराया और मामले की जाँच की, विभिन्न लोगों के बयान लिए। पुलिस ने पाया कि परिस्थतियाँ ऐसी हैं कि बितरा को उस की पत्नी और उस के प्रेमी श्रीनू ने आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अंतर्गत अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। अदालत ने गवाहियाँ और अन्य सबूतों के आधार पर अपना निर्णय सुनाते हुए दोनों को बितरा को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का दोषी पाया और श्रीनू को पाँच साल के कठोर कारावास व सौ रुपए जुर्माने व जुर्माना अदा न करने पर एक माह और कैद भुगतने की सजा दी। बितरा की पत्नी को पाँच वर्ष कैद की सजा सुनाई गई।

अदालत के इस निर्णय के विरुद्ध श्रीनू और बितरा की पत्नी ने एक संयुक्त अपील सेशन जज गुण्टूर के समक्ष  प्रस्तुत की जिस पर अदालत ने दोनों की सजा को कम कर के तीन वर्ष के साधारण कारावास में परिवर्तित कर दिया। सेशन न्यायालय द्वारा परिवर्तित दंडादेश के निर्णय के विरुद्ध दोनों ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत की। उच्चन्यायालय ने श्रीनू के विरुद्ध सजा को बरकरार रखा लेकिन बितरा की पत्नी की सजा को कम कर के एक वर्ष कर दिया। इतनी सजा वह भुगत चुकी थी जिस के कारण वह जेल से छूट गई। श्रीनू ने उच्चन्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की जहां उसे जमानत मिल गई।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में 28 मई 2009 को अपना निर्णय सुनाया। श्रीनू के वकील की दलील थी कि श्रीनू कि बितरा के साथ कोई दुश्मनी नहीं थी और उस का ऐसा कोई इरादा भी नहीं था कि बितरा आत्महत्या कर ले।  उस ने बितरा को आत्महत्या के लिए बिलकुल नहीं उकसाया, वह निर्दोष है इस कारण उसे निर्दोष घोषित किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सुना और गवाहों और सबूतों को देखा। विशेष रूप से बितरा के साले के बयान को देखा जिस में उस ने कहा था कि 02.01.1996 को उस का पिता बहिन को उस के घर छोड़ कर गया था और यह बता कर गया था कि उस की बहिन के श्रीनू के साथ नाजायज ताल्लुकात हैं।  उसे वह वहाँ इसलिए छोड़ कर जा रहा है कि वह उसे समझाए जिस से वह बितरा के साथ शेष जीवन ईमानदारी से बिताए। लेकिन उसी दिन श्रीनू वहाँ आ गया और उस की बहिन को ले जाने लगा। उस ने इस का विरोध किया। लेकिन श्रीनू उस की बहिन को साथ ले गया और वह भी साथ चली गई। मैं ने डर के मारे जबरन उन्हें नहीं रोका।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि श्रीनू का बितरा के घर जाना और वहाँ आने के लिए मना करने पर यह कहना कि वह कि बितरा की पत्नी उस की प्रेमिका है और वह वहाँ तब तक आता रहेगा जब तक वह खुद उसे मना नहीं करती। इस के बाद उस का उस के पिता और भाई के घर जाना और बितरा की पत्नी को चार दिन साथ रख कर वापस छोड़ जाना ऐसा व्यवहार है जिस से एक ही अर्थ निकाला जा सकता है कि दोनों ने मिल कर ऐसा व्यवहार किया जिस ने बितरा को आत्महत्या के लिए उकसाया।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में बितरा को दोषमुक्त करने और उस की सजा को और कम करने से इन्कार कर दिया और आदेश दिया कि वह अदालत के समक्ष शेष सजा भुगतने के लिए आत्मसमर्पण करे। 

उक्त मूल निर्णय यहाँ क्लिक कर के पढ़ा जा सकता है।

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