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Friday 10 July 2009

राजस्थान का बजट न्यायार्थियों के लिए बहुत निराशाजनक

राजस्थान का बजट आ चुका है।  उस की आलोचना भी हो रही है और तारीफ भी। तीसरा खंबा ने अर्जुन की आंख की तरह केवल यह तलाशना आरंभ किया कि न्याय व्यवस्था के लिए इस में क्या है? इस ने मुझे बहुत निराश किया।  यह बजट राज्य के न्यायार्थियों के लिए बहुत ही निराशाजनक है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायाधीश ने पिछले दिनों राज्यसरकारों से अपील की थी कि उन्हें देश में तुरंत दस हजार (10000) अधीनस्थ न्यायालय चाहिए वरना देश की न्याय व्यवस्था को बचा पाना असंभव हो जाएगा। इस अपील के बाद यह आशा की जाती थी कि राज्य सरकार राजस्थान में कम से कम 100 नयी अदालतें स्थापित करने के लिए बजट में प्रावधान करेगी।  लेकिन जब बजट सामने आया तो उस से पूरी तरह निराशा हुई है कि राज्य सरकार प्रदेश को न्याय दिलाने के मामले में पूरी तरह उदासीन है।

आज राजस्थान में हालात यह हैं कि  मजिस्ट्रेट स्तर की अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक फौजदारी  मामले केवल धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के ही हैं। अधिकांश अदालतों में दो हजार से चार हजार या उस से भी अधिक मुकदमे लम्बित हैं।  प्रत्येक अदालत के पास फौजदारी के साथ ही दीवानी मुकदमे भी होते हैं। मुकदमों के इस अम्बार को निपटाने के लिए तुरंत अदालतों की संख्या को दुगना किया जाना आवश्यक है। दीवानी मुकदमे जो दो वर्ष में एक अदालत से निर्णीत हो जाने चाहिए, वे बीस-बीस वर्ष ले रहे हैं। जो पीढ़ी मुकदमा लगाती है निर्णय उस से अगली पीढ़ी ही देख पाती है। फौजदारी मुकदमों में देरी के कारण अपराधियों को सजा नहीं हो पाती और समाज में अपराध दर लगातार बढ़ रही है। यदि नई अदालतें नहीं खुलती हैं तो उस का परिणाम समाज के लिए यह होगा कि लोग अपने विवादों को सड़कों पर बाहुबल से निपटाने लगेंगे और समाज अराजकता की ओर बढ़ेगा।

न्यायालयों में मुकदमों में निर्णय न होने से मुवक्किलों और वकीलों के बीच तथा वकीलों और जजों के बीच असंतोष सीमा के बाहर होता जा रहा है।  हाल ही में दिल्ली में एक जज के साथ हुई घटना  के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है।  अब वह समय है कि नयी अदालतों की स्थापना के लिए जनता  राज्य सरकार और केंद्र सरकार के विरुद्ध संघर्ष के मैदान में उतरे। इस विषय पर वकीलों और उन के संगठनों को भी तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।  इस विषय को वे ही गंभीरता से समझ सकते हैं और जनता का नेतृत्व कर सकते हैं।

11 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari 10 July, 2009 5:41 AM  

यह सिर्फ राजस्थान नहीं, हर प्रदेश और पूरे देश की बात है कि यह असंतोष अपने चरम पर पहुँच ही रहा है.

नारदमुनि 10 July, 2009 6:43 AM  

is kalyug me nayay ki baat! aajkal to faisale hote hai nayay nahi. narayan narayan

ताऊ रामपुरिया 10 July, 2009 7:30 AM  

आपकी चिंता जायज है. सरकारें आजकल बिना परेशान किये आसानी से कुछ नही देती.

रामराम.

विनोद कुमार पांडेय 10 July, 2009 10:26 AM  

badhiya jaankari,

parantu aaj pure desh ka yahi haal hai..aaj jahan nyayalay hai wahan bhi nyaay hone me barason lag jate hai..

prahshasan aur sarkaar kuch soch hi nahi rahi hai..

नरेश सिह राठौङ 10 July, 2009 2:29 PM  

नयी अदालतो का गठन बहुत जरूरी हो गया है । आपका यह आलेख बहुत सुन्दर लिखा गया है । अदालती कामों की आजकाल ओनलाईन काफी जानकारी मिलने लगी । हो सके तो इस पर भी एक पोस्ट लिखे कि कौनसी साईट पर अदालती कार्यवाही की कौनसी जानकारी मिल सकती है ?

राज भाटिय़ा 10 July, 2009 2:37 PM  

जब सरकार मै ही आधे से ज्यादा ऎसे लोग है जिन्हे सजा होनी चाहिये तो सरकार न्यायालयों की संख्या बढा कर अपनी पार्टी की संख्या केसे कम कर दे... ऎसे कारण भी तो हो सकते है ??? यानि बहुत कुछ हो सकता है

काजल कुमार Kajal Kumar 10 July, 2009 3:22 PM  

बहुत खेद की बात है ये.

अभिषेक ओझा 10 July, 2009 4:11 PM  

बड़ी आलिशान विधान सभा है राजस्थान की !

डॉ. मनोज मिश्र 10 July, 2009 9:21 PM  

अब यह हर प्रदेश की कथा होने वाली है.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 15 July, 2009 12:47 PM  

आश्‍चर्य का विषय है।

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