कुछ विशेष निर्बंधन जो अपराध हैं : वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार (8)
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार के होते हुए भी जितने भी कानून कानून की किताबों में मौजूद हैं और जो भारत में प्रभावी हैं वे यदि इस अधिकार पर कोई निर्बंधन लगाते हैं तो वे सभी निर्बंधन तब तक लागू हैं जब तक कि उन्हें किसी न्यायालय द्वारा संविधान सम्मत नहीं मानते हुए निरस्त (ultra-virus) घोषित नहीं कर दिया जाता है। बहुत सी वाक् प्रस्तुतियों और अभिव्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। ये सभी निर्बंधन के रूप में प्रभावी हैं।
दुष्प्रेऱण- भारतीय दंड संहिता का अध्याय-5 दुष्प्रेरण के विषय में हैं। इस में यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को किसी बात को करने के लिए उकसाता है तो वह दुष्प्रेरण करता है जो कि एक अपराध है। दुष्प्रेरण का कोई भी कृत्य यदि कोई व्यक्ति वाक् अथवा किसी अभिव्यक्ति के माध्यम से करता है तो वह अपने इस कृत्य के लिए उक्त स्वतंत्रता के मूल अधिकार का संरक्षण प्राप्त नहीं कर सकता। चूंकि यह दुष्प्रेरण एक अपराध है इस कारण से दुष्प्रेरण का दुष्प्रेरण भी अपराध है। उदाहरणार्थ मैं अपने आलेख में किसी अन्य लेखक को कोई खास प्रकार का आलेख लिखने के लिए प्रेरित करता हूँ और ऐसा आलेख लिखे जाने पर वह किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है तो यह समझा जाएगा कि मैं ने भी दुष्र्पेरण का अपराध किया है।
भारतीय दंड संहिता की धारा 121 में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध का दुष्प्रेरण एक गंभीर अपराध है। इसी प्रकार तीनों सेनाओं के सैनिक को विद्रोह के लिए उकसाने को अपराध घोषित किया गया है और इस उकसाने पर वाकई कोई विद्रोह होता है तो ऐसे उकसाने को और गंभीर अपराध घोषित किया गया है। दि कोई इस प्रकार की अभिव्यक्ति करे जो कि भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध अथवा किसी सैनिक को विद्रोह के लिए उकसाती है तो यह अपराध होगा और इस के लिए कोई नागरिक मूल अधिकार की संरक्षा प्राप्त नहीं कर सकता।
भारतीय दंड संहिता की धारा 153क में प्रावधान है कि राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले लांछन और प्राख्यान भी गंभीर दंड हैं। धारा 292,293 तथा 294 अश्लील पुस्तकों और वस्तुओं आदि के विक्रय के संबंध में तथा अश्लील गानों के संबंध में अपराधों को परिभाषित करती हैं। धारा-295-क विमर्शित और विद्वेषपूर्ण कार्यों को जो किसी वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वासों का अपमान कर के उस की धार्मिक भावनाओं को आहत करे के आशय से किए गए हों अपराध घोषित करता है। धारा 298 धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के विमर्शित आशय से शब्द उच्चारित करने को अपराध परिभाषित करती है। यदि कोई नागरिक इन परिभाषित अपराधों में वर्णित कोई कृत्य या अकृत्य करता है तो उस का यह कृत्य उक्त स्वतंत्रता के मूल अधिकार से परे होगा और उसे मूल अधिकार के आधार पर कोई संरक्षा प्राप्त नहीं होगी।
(क्रमशः जारी)







13 टिप्पणियाँ:
गंभीरता से पढ़ रहे है . आगे आप ब्लॉग लेखन और उससे जुड़े कानूनी निहितार्थ , उदहारण देकर , बताएं तो ब्लॉग जगत के लिए बड़ी सेवा होगी .
आभार इस ज्ञानवर्धक आलेख का!!
कितनी पाबन्दियाँ है मह्फ़िल मे,
दिल की बातें तो रह गयी दिल में।
काटने-तौड़ने में हर्ज नही,
वह तो शामिल नही अभी Billमें ?
मन्सूर अली हाश्मी
aaj bhee rochk jaankaaree.
बहुत उपयोगी लेख , शुभकामनायें भाई जी !
काश डालने ब्लाग लेखन में कानूनी वर्जना और अपराध विषय पर प्रका कष्ट अवश्य करें
बहुत अच्छी जानकारी मिली. धन्यवाद.
रामराम.
बहुत ही अच्छी अच्छी जानकारिया बता रहे है आप.
धन्यवाद
वाकई, ये तो ध्यान रखने वाली बातें हैं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
गंभीर जानकारी के लिए आभार.
बहुत अच्छी जानकारी दे रहें है आप।
बस ऐसे हम जैसे लोगो से अपना अनुभव बाटंते रहें
आभारी
उपयोगी जानकारी है आपके पिछले आलेख भी संग्रहणीय हैं आभार्
उपयोगी जानकारी है आपके पिछले आलेख भी संग्रहणीय हैं आभार्
रापकी इस कलम को सलाम करना पडेगा कि आप अपना कीमती समय निकाल कर हम जैसे अनजान लोगों को इतनी उपयोगी जानकारी दे रहे हैं आभार्
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