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Wednesday 1 July 2009

किस तरह के निर्बंधन लगाये जा सकते हैं? : वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मूल अधिकार (7)

इस श्रंखला में हमने वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार और उस के विभिन्न रूपों के बारे में जाना।  भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने की व्यवस्था की है। यह अनुच्छेद इस प्रकार है ...
(2) खंड (1) के उपखंड (क) की कोई बात उपखंड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अवमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधन जहाँ तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहाँ तक उस के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंधन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने में राज्य को निवारित नहीं करेगी।   
इस तरह यह अनुच्छेद जिन आधारों पर नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निर्बंधन लगाने के लिए कानून बनाने के लिए और वर्तमान कानूनों का प्रवर्तन कराने का अधिकार राज्य को प्रदान करती है वे इस तरह होंगे-
  1. भारत की प्रभुता व अखंडता के हित में;
  2. राज्य की सुरक्षा के हित में;
  3. विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के हित में;
  4. लोक व्यवस्था बनाए रखने के हित में;
  5. शिष्टाचार या सदाचार के हित में;
  6.  न्यायालय-अवमानके संबंध में;
  7. मानहानि के संबंध में तथा 
  8. अपराध-उद्दीपन के संबंध में। 
 उक्त मामलों में यदि विधायिका किसी कानून का निर्माण करती है तो न्यायालय उस कानून के द्वारा लगाए गए निर्बंधनों को केवल इस आधार पर निरस्त नहीं कर सकती है कि वे नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं।  लेकिन वे इस तथ्य पर विचार कर सकते हैं कि जो निर्बंधन लगाए गए हैं वे युक्तियुक्त हैं या नहीं हैं।  युक्तियुक्तता की जाँच करने के संबंध में न्यायालय की शक्तियाँ असीमित हैं।  इस पर विचार करते हुए न्यायालय का मानक यह रहेगा कि क्या एक सामान्य व्यक्ति इन निर्बंधनों को युक्तियुक्त मानता है या नहीं। न्यायालय यह विचार कर सकता है कि जो निर्बंधन लगाए गए हैं क्या उस से कम निर्बंधनों को लगाने से भी उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है?  निर्बंधनों को उस बुराई के अनुपात में होना चाहिए जिसे रोकने के लिए उसे लगाया जा रहा है। निर्बंधन की युक्तियुक्तता पर विचार के लिए न्यायालय कानून के उद्देश्य, देश की तत्कालीन परिस्थितियों, और निर्बंधन की प्रकृति, तात्कालिकता और उस की समय सीमा पर विचार कर सकता है। कानून द्वारा वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जा रहे निर्बंधन से अति नहीं होना चाहिए और उसे  मनमाना भी नहीं होना चाहिए, वह ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि मूल अधिकार को ही ध्वस्त कर दे।  निर्बंधन को अस्पष्ट और अनिश्चित नहीं होना चाहिए।  निर्बंधन को सदैव ही न्यायिक पुनरीक्षण के लिए उपलब्ध होना चाहिए।


वर्तमान कानूनों के अंतर्गत बहुत से निर्बंधन नागरिकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर लगे हुए हैं। जिन में से बहुतों को भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध की श्रेणी में रखा हुआ है।  इन निर्बंधनों का उल्लंघन किए जाने पर किसी को भी अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है और यह सिद्ध हो जाने पर कि कोई व्यक्ति उन निर्बंधनों में से किसी एक या एकाधिक के उलंघन का दोषी है तो कानून के अनुसार उसे दंडित किया जा सकता है। 

आगे हम  कुछ प्रमुख निर्बंधनों के संबंध में  जानेंगे। (क्रमशः जारी)


10 टिप्पणियाँ:

अविनाश वाचस्पति 1 July, 2009 5:42 AM  

जय हो।
इतना कठिन लिखा है कि समझने के लिए वकील अथवा अपराधी बनना होगा।

Udan Tashtari 1 July, 2009 6:17 AM  

बहुत काम की जानकारी-आगे कड़ियों का इन्तजार है.

अजय कुमार झा 1 July, 2009 7:49 AM  

दिनेश जी ..निर्बन्धन की व्यवस्था इतनी व्यापक है की ..कभी भी किसी को भी इनके दायरे में लाया जा सकता है..अगले अंक का इन्तजार रहेगा.

Mansoor Ali 1 July, 2009 8:26 AM  

बांधता कानून हमको सब जगह,
मुक्त करवा देती युक्तियुक्तता.

-मंसूर अली हाश्मी

डॉ. मनोज मिश्र 1 July, 2009 8:28 AM  

इतनें कानूनों के बाद भी इतनी समस्याएं ? आप रोचकता बनाये हुए है ,प्रतीक्षा है .

Nirmla Kapila 1 July, 2009 9:10 AM  

सोचा तो था कि जब सब कडियाँ पूरी हो जायें गी तभी आपकी सारी पोस्ट पढूंम्गी मगर ये तो इतने दिनों से चल ही रही हैं इस लिये आज पिछली सभी कडियाँ पढ गयी अब बुढापे मे याद्दाश्त रहती नहीं इस लिये एक बार मे ही पढ्ना सुविधजनक लगता है आपने बहुत अच्छी जान्कारी सहज शब्दों मे दी है बहुत बहुत धन्यवाद अगली कडी का इन्तज़ार रहेगा आभार्

ताऊ रामपुरिया 1 July, 2009 12:02 PM  

बहुत अच्छी जानकारी मिल रही है.

रामराम.

राज भाटिय़ा 1 July, 2009 3:06 PM  

एक अच्छी जानकारी दी आप ने
धन्यवाद

alka sarwat 1 July, 2009 3:18 PM  

माननीय दिनेश जी ,मेरे ब्लॉग का अनुसरण करके मेरा हौसला बढाने के लिए शुक्रिया
पुनश्च मैं चिंता में हूँ कि हमारी न्यायपालिका तो अनेक हथियारों से लैस है फिर न्याय मिलने में इतनी देर क्यों लगती है युक्तियुक्ताता से आम आदमी कम अपराधी ज्यादा बच निकलते हैं

बवाल 2 July, 2009 11:23 PM  

आदरणीय सर, इस अत्यन्त ज्ञानवर्धक आलेख के बहुत बहुत आभार आपका।

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