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Thursday 11 June 2009

आज नहीं कल जमीनी हकीकत तो समझनी ही होगी

हमारी वकील बिरादरी में दो कहावतें मशहूर हैं कि वकील को बिना फीस अपने पिता को भी सलाह नहीं देना चाहिए और बिना मांगे सलाह देने वाला वकील मूर्खों का सरताज है।  मैं इन कहावतों की कल तक उपेक्षा करता रहा।  लेकिन आज लगता है कि वर्षों से जो कहावतें वकीलों के बीच प्रचलित हैं वे अवश्य ही कई पीढ़ियों के अनुभव का निचोड़ रही होंगी।   जब से मैं हिन्दी ब्लाग जगत का भाग बना हूँ, इसे एक परिवार माना है। वैचारिक मतभेद तो परिवार में पिता-पुत्र में भी होते हैं और भाई-भाई के बीच भी।  यही सोच कर अपने परिवार के एक सदस्य को विनम्रता पूर्वक एक सलाह दी।  भाई ने सलाह को माना भी।  लेकिन लोग यह समझाने में लगे हैं कि यह सलाह नहीं थी अपितु धमकी थी।  सारी स्वतंत्रताओं पर पाबंदी लगाई जा सकती है। विचार प्रकट करने की स्वतंत्रता पर पाबंदी प्रत्यक्ष रूप से बहुत लोगों ने नहीं देखी होगी,  लेकिन हम ने 1975 से 1977  तक उसे भोगा भी है। 

पिछले दो दिनों में एक बात और समझ में आई कि ब्लाग जगत की स्मृति की आयु बहुत क्षीण है। कभी-कभी वह केवल मात्र सप्ताह भर की अथवा दो या तीन दिन की होती है।  अभी डी-अजित के मामले को हुए चार माह भी पूरे नहीं हुए हैं,  जिस पर सारा ब्लाग जगत हलकान हुआ जा रहा था।  केरल के 19 वर्षीय विद्यार्थी डी-अजित के विरुद्ध उन के द्वारा ऑर्कुट पर स्थापित कम्युनिटी पर आई टिप्पणी के लिए महाराष्ट्र में एक मुकदमा दर्ज कराया गया।  उन्हें केरल उच्चन्यायालय से अंतरिम जमानत करानी पड़ी। वे उस मुकदमे में प्रथम सूचना रिपोर्ट को खारिज कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहुँचे। जहाँ उन की याचिका अस्वीकार कर दी गई और उन्हें कहा गया कि उन्हें महाराष्ट्र उच्चन्यायालय में ही जा कर ऐसी याचिका प्रस्तुत करना चाहिए। आगे क्या हुआ यह पता नहीं।  मुझ से इस मामले पर एक आलेख लिखने को कहा गया था। वह जनादेश पर प्रकाशित हुआ।  सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि डी-अजित कम्प्यूटर विज्ञान के विद्यार्थी हैं कोई बालक नहीं।  उन्हें जानना चाहिए कि जो कुछ वे कर रहे हैं वह देश के कानून के मुताबिक है या नहीं।  आगे डी-अजित के मुकदमे का क्या हुआ यह अभी पता नहीं। लेकिन केरल हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट फिर बोम्बे हाइकोर्ट तक का सफर तो उन का पता है।  कैसे उन्हों ने यह सफर किया होगा? कैसे एक विद्यार्थी ने इन तीन अदालतों का खर्च जुटाया होगा? इस अदालती भागदौड़ में उन के अध्ययन का क्या हुआ होगा? और इस से भी आगे उन के भविष्य के कैरियर का क्या होगा? इन सब का केवल अनुमान किया जा सकता है।  वैसे अन्तर्जाल पर प्रकाशित कृतियों की जिम्मेदारी के विषय में नए कानून भी बने हैं। आप चाहें तो नीचे के चित्र पर क्लिक कर उस की एक बानगी देख सकते हैं।



कोई कहीं भी लिखे, अखबार में, किताब में या फिर किसी अंतर्जाल पर प्रकट किए गए शब्दों का मूल्य कानून की दृष्टि में भिन्न नहीं है। उसी समय ब्लाग जगत का सामान्य मानस यह बना कि अपने विचारों को ऐसी भाषा में लिखना चाहिए जिस से वे किसी कानून की जद में न आएँ।  डी-अजित को उन के खुद के लिखे के कारण यह सब नहीं भुगतना पड़ा था अपितु उन के द्वारा स्थापित कम्युनिटी पर आई एक टिप्पणी उस का कारण  थी। क्यों कि टिप्पणी उन की खुद की साइट पर प्रकाशित हुई थी, वे प्रकाशक थे।  कानून प्रकाशक पर भी उतनी ही जिम्मेदारी डालता है जितनी कि कृतिकार पर।  इस कारण यह मानस भी बना कि टिप्पणियों पर भी मॉडरेशन होना चाहिए। जिस से उन के प्रकाशन का नियंत्रण प्रकाशक ब्लागर के स्वयं के हाथ रहे।  उसी समय अनेक ब्लागरों ने अपने ब्लाग पर यह व्यवस्था लागू भी कर दी।  मैं स्वयं इस दम्भ में रहा कि मेरे ब्लागों पर ऐसी कोई टिप्पणी हो ही नहीं सकती।  लेकिन पिछले दो दिनों ने मेरे इस दम्भ को तोड़ दिया।  नतीजा यह हुआ कि मुझे कुछ प्रकाशित टिप्पणियों को हटाना पड़ा और उन पर मॉडरेशन आरंभ करना पड़ा।

एक ब्लागर जो आम इंसान है वह ब्लागिंग से आई मुसीबतों का सामना करने पर टूट सकता है। इस तथ्य को हम सभी जानते हैं, भले ही इसे स्वीकार करें या न करें।  जिस तरह मेरी सलाह को धमकी मान कर दी गई प्रतिक्रियाओं में कहा गया है और कहा जा रहा है कि जो कुछ कहा जा चुका है उस पर ड़टे रहना चाहिए। वह भी कहा जा सकता है। यदि लेखक केवल ब्लागर न हो कर एक मिशन का सदस्य हो। क्यों कि मिशन का सदस्य तो सब कुछ अपने मिशन पर कुर्बान करने का साहस  रखता है।  वह अपना शीश तक अर्पण कर सकता है।  भगत सिंह ने अपने आप को स्वैच्छा से ही कुर्बान किया था।  यदि ऐसा है तो निश्चित रुप से मेरी सलाह को धमकी के बतौर ही लिया जाना चाहिए।  मैं ने अपनी सलाह का निवेदन एक बेहद निजि ई-मेल के द्वारा किया था। कोई जरूरी नहीं था कि उस निवेदन को स्वीकार किया ही जाता।   लेकिन उसे निवेदन समझ कर स्वीकार किया गया।   हर व्यक्ति समाज में अपनी भूमिका अपनी समझ के अनुसार अदा करता है।  आज किसी की भूमिका को गलत और सही नहीं ठहराया जा सकता।  इस का निर्णय तो आने वाला वक्त करेगा।  लेकिन भावनात्मक आवेश में आ कर अपने ही जीवन में काँटे बिछा लेना और अपने लक्ष्य की राह में रोड़े खड़े करने को कोई भी बुद्धिमानी नहीं कह सकता।   आज नहीं कल जमीनी हकीकत तो समझनी ही होगी।

21 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 11 June, 2009 7:29 PM  

Dinesh jee,
mujhe nahin pata tha ki hindi blogjagat mein itnee ugra kriyaa aur pratikryaaon ka daur bhee chaltaa hai..kai baar anaam kee teekhee pratikriyaaon ke baavjood vichlit nahin hua...arun jee ke aalekh ke baad uthe saare prakran par meri najar hai..jante hain main sirf ek baat gaur kee hai..sabhi arun jee ko is baat ke liye dosh to de rahe hain ki unhone aapkee salaah maan kar kisi bhee nyaayik mushkil mein khud ko padne se bachaane ke liye samay par us post ko hata diya...aur unke post ko link de de kar baar baar laga bhee rahe hain..magar koi waisee hee teekhee bhashaa kaa prayog nahin kar raha..rahee baat adaalatee kaaryavahee kee to der saver ye bhee ho hee jaayegee kisi na kisi ke upar ..yadi abhi hee anaam roop se tippnni karne waalon kaa naam pata chal jaaye to ..fir dekhiye na kya hota hai...jo bhee hai iska pataakshep hona chaahiye....

परमजीत बाली 11 June, 2009 7:39 PM  

आप ने जो सलाह दी वह गलत कतई नही है। सलाह देना या किसी को सचेत करना मानव धर्म है।आप ने अपना कर्तव्य निभाया।इसे इसी तरह निभाते रहे।क्यूँ कि हम जैसा ब्लोगर कानूनी पेचीदगीयों को नही जानता।

Sachi 11 June, 2009 7:44 PM  

aajkal bhalai ka jamana nahin hai. aap kyon bhool jaate hain?

haan insaan ko apna farz jaroor nibhana chahiye,
aapke salah bahut zaroori hain, dete rahiye,,
Sachi

श्यामल सुमन 11 June, 2009 7:52 PM  

कम से कम मैं तो कानूनी बारीकियों से बिल्कुल अन्जान हूँ दिनेश भाई। आपने बहुत अच्छा सलाह दिया और यह नेक काम करते रहें। आपको बहुत बहुत धन्यवाद।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.

Nitish Raj 11 June, 2009 8:02 PM  

दिनेश जी बहुत पहले या यूं कहूं जब मैंने दो या चार पोस्ट ही की थी तो एक कविता पर आपने मेरे को एक कमेंट किया था उसके जवाब में मैंने आपको धन्यवाद वाया जीमेल भेजा था। वो पोस्ट आज भी वहीं हैं और वो टिप्पणी भी। आपकी सलाह मैंने तब भी मानी वो ही अरुण(पंगेबाज)ने मानी और मानकर सही भी किया और उसको डंके की चोट पर कहा कि द्ववेदी का धन्यवाद। मुझे लगता है आग लगाने वाले बहुत होते हैं बुझाने वाले कम। आपने बुझाने का काम किया है बहुत अच्छा है। मैं तो इस कानून के बारे में जानता हूं और एक पोस्ट फिल्म जगत पर पोस्ट करने जा रहा हूं पर उसमें बड़ा सोच विचार कर लिख रहा हूं कहीं फंस ना जाऊं। दूसरों की नहीं अपने दिल की बात मांनें और अपनों की ही सुनें और जो दिल कहे वो करें। आपने अरुण को एक मुसीबत से छुटकारा दिलाया उसके लिए फिर से धन्यवाद करता हूं साथ ही अरुण की तरफ से भी।

Nitish Raj 11 June, 2009 8:07 PM  

द्विवेदी जी माफी चाहूंगा एक जगह गलती से दो मात्रा छूट गईं हैं, कृप्या ठीक कर दीजिएगा .....उसको डंके की चोट पर कहा कि .......द्विवेदी जी..... का धन्यवाद।

लोकेश Lokesh 11 June, 2009 8:19 PM  

कहावतें अपने समय काल के हिसाब से बनी थीं और सारगर्भित थीं। बदलते समय के परिप्रेक्ष्य में भी उनके अर्थ बने हुये हैं।

आपने संतुलित रह कर एक निजी सलाह दी वह एक विवेकशील व्यक्ति को उचित लगी। यदि एक परिवारनुमा ब्लॉग जगत की परिकल्पना में यह हो रहा है तो शुभ संकेत है।

पिछली सदी में यूरोप के एक वकील की गर्वोक्ति थी कि तुम मुझे किसी भी व्यक्ति के हाथ की लिखी चार लाईनें ला दो, मैं उसमें से ऐसा कुछ निकाल दूँगा कि उस व्यक्ति को फाँसी हो जाये! वह वकील ना तो विक्षिप्त था और ना ही सिरफिरा।

हाँ आजकल हो सकते हैं :-)

Neeraj Rohilla 11 June, 2009 10:09 PM  

दिनेशजी,
यूँ ही नहीं कहा जाता कि Common sense is not so common. भावनाओं में कहना बहुत आसान है कि जो कहना था कह दिया अब देखा जायेगा, और बहुत से लोग मत बदलने को कमजोरी की निशानी के तौर पर मानते हैं। लेकिन क्या किया जाये,
पंगेबाज का बकलमखुद पढा था तो उनके जीवन से बहुत प्रभावित हुआ था, आज भी हूँ लेकिन उनके विचारों से असहमति है और रहेगी। यही बात सुरेश चिपलूनकर के लिये है। लेकिन एक स्वस्थ व्यवस्था में असहमति के चलते डंडा लेकर पिल पडने को सही नहीं माना जा सकता। आन द रेकार्ड कह दें कि उनके विचारों से असहमति का ये अर्थ नहीं कि हम उनके विचार गलत मानते हैं। हो सकता हो वो सही हों और हम गलत लेकिन असहमति है।

इसके अलावा एक अन्य बात जो हिन्दी ब्लाग जगत में देखने को मिलती है वो ये है कि यहाँ लोग असहमति कम जताते हैं और दूसरे के पक्ष को गलत साबित करने का प्रयास अधिक करते हैं। लोकतंत्र में अपनी राय बनाने का हक हमको है लेकिन ये जिद की हमारी राय ही ठीक है उचित नहीं है। बस इसी जिद पर बहस खत्म हो जाती है, क्योंकि इसके बाद तर्कों/कुतर्कों का जो सिलसिला चालू होता है उससे मन खट्टा हो जाता है।

पंगेबाज की पोस्ट की भाषा ठीक नहीं लगी, इसीलिये बिना कुछ लिखे केवल पढकर निकल लिये, फ़िर उन्होने आपकी ईमेल का जिक्र करके सहृदय भावना से पोस्ट को निकाल दिया तो मन और खुश हो गया। लेकिन उसके बाद जो कुछ हुआ, खैर अब क्या कहें।

लोगों को शायद ये भी याद हो कि कोई मिस्टर कुंटे का भी बरखा दत्त के साथ विवाद हुआ था जिसके चलते उन्हें बिना शर्त माफ़ी के साथ अपनी पोस्ट को निकालना पडा था। अब सही गलत का फ़ैसला तो बाद में है, मुख्य प्रश्न है कि क्या आप इतना झंझट उठाने को तैयार हैं। अगर आपका उद्देश्य आन्दोलन चलाना है तो आपको बधाई लेकिन एक आम ब्लागर का उद्देश्य शायद इससे इतर हो।

आपने इस मुद्दे को उठाकर हम सभी का मार्गदर्शन किया इसके लिये आपको बधाई। यही सब आपको व्यक्तिगत ईमेल में लिखना चाहता था लेकिन आपकी पोस्ट देखी तो यहीं लिख रहा हूँ।

आभार,
नीरज रोहिल्ला

अनूप शुक्ल 11 June, 2009 10:27 PM  

द्विवेदीजी, अब चूंकि हम वकील तो हैं नहीं इसलिये हमारे उप्पर आपकी दोनों कहावतें लागू नहीं होतीं। इसलिये हम मुफ़्तिया सलाह दे रहे हैं जबरिया। :)

पहली तो ये कि इस पोस्ट को लिखने की कौनौ जरूरत नहीं थी। आपने अपना काम किया, सही किया गलत किया लेकिन अपनी समझ में अरुण अरोरा को एक शुभेच्छु के रूप में सलाह दी। उन्होंने उसी रूप में ग्रहण भी किया और अपनी पोस्ट भी हटा ली। अब लोग उसे कैसे लेते हैं यह उनकी समझ है। हरेक की समझ का बीमा आप नहीं करा सकते न!अपनी बात की सफ़ाई के लिये इत्ती बड़ी पोस्ट लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। ये बेफ़ालतू काम है जी!

हम चूंकि आपसे सीनियर ब्लागर हैं और इस तरह की बेफ़ालतू सफ़ाई नुमा पोस्टों से गुजर चुके हैं (अब तो आप भी टहल लिए इस गली में) इसलिये मेरी समझ में व्यक्तिगत आक्षेपों पर बहुत सफ़ाई देने के लिये पोस्ट लिखने का कोई फ़ायदा नहीं होता। बल्कि लोग अपनी मर्जी के वाक्य ले-देकर और मौज लेने का मौका तलाश लेते हैं (हम भी तो वही कर रहे हैं)आपने जितनी बात शिवजी की ब्लाग पोस्ट पर लिखी वह अपने में काफ़ी थी।

यह सलाह अपनी कई बार कही एक बात को दोहराते हुये दे रहे हैं- वह व्यक्ति अभागा होता है जिसे कोई टोकने वाला नहीं होताहम इसीलिये आपको टोंक रहे हैं काहे कि हम भी आपके शुभेक्छु होने का भ्रम पाले हुये हैं।

आशा है कि आप मेरी बात से नाराज न होंगे। और अगर नाराज हो भी जायेंगे तो हमें कौनौ डर नहीं है। बस सूचित कर दीजियेगा हम मना लेंगे। :)

राम त्यागी 11 June, 2009 11:37 PM  

1. First thing if you are writting something , then be firm on that.
2. Everyone has right to write and express his own sentiments, i am sure those words are not going to please everyone so there will be difference of opinion
3. you did you job, we are doing our job, that's the meaning on blogging where you have freedom of expression in your own home, of course you are responisbile for ur acts as you are doing it in public but before posting anything concern person should be mature enough to post the thing.
4. let's not take the things personal

5. there are other issues where we can focus our energy other than fighting each other

venus kesari 12 June, 2009 12:28 AM  

आग लगाने वाले ज्यादा हैं बुझाने वाले ...........

वीनस केसरी

राज भाटिय़ा 12 June, 2009 1:00 AM  

दिनेश जी , मुझे पुरी बात तो नही मालूम लेकिन अमि इतना ही कहुंगा कि आप ने सलाह दे कर कुछ गलत नही किया, यह तो ब्लांग की बात है, अगर हम मुंह से भी किसी को गलत बोल दे तो उस की भी सजा है, अगर हम किसी को गाली दे, या फ़िर गलत इशारा करे तो वो भी सजा के लायक है.इस लिये आप ज्यादा ना सोचे.
आज सुबह मुझे किसी अनामी की टिपण्णी आई जो मुझे बेतुकी लगी, उस मै आप का ओर पंगेवाज का नाम था, फ़िर कुछ सोच कर मेने उसे डिलिट कर दिया,शयद मेल मै पढी हो.
बाकी आप हमारे आदर्णीया है,इस लिये एक दो लोगो की बातो को दिल से ना लगाऎ
धन्यवाद

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` 12 June, 2009 4:34 AM  

दीनेश भाई जी,
विवादोँ मेँ बात हमेशा बढ जाती है ...
ये मेरा भी निजी अनुभव रहा है
किसी व्यक्ति की दीवँगत अम्मा के लिये ,
" विवादीत वाक्य " लिखना भी
न्याय प्रणाली द्वारा
दँडित हो सकता है क्या ?
- लावण्या

Mansoor Ali 12 June, 2009 7:21 AM  

मैरे राह्बर मुझ्को गुमराह करदे,
सुना है कि मन्ज़िल करीब आ गयी है।

'खुमार' ने क्या खूब कहा है……अगर मन्ज़िल मिल गयी तो फ़िर क्या करेंगे?……इस्लिये जो भटकते रहना चाहता है, उसे छोडो!

नोट:यह सलाह चार्जेबल है……फ़ीस= टिप्पणी पर एक टिप्पणी!

काजल कुमार Kajal Kumar 12 June, 2009 10:55 AM  

अनूप जी ने ठीक ही लिखा है "वह व्यक्ति अभागा होता है जिसे कोई टोकने वाला नहीं होता".
सही सलाह न मानना भी बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती. आप अनुभवी हैं. आपका कहना बनता है. कोई न माने तो प्रभुइच्छा ..

Anil Pusadkar 12 June, 2009 11:28 AM  

आदरणीय वकील साब अदालत पर एक पोस्ट लिखते समय मैने आपसे सलाह मांगी थी और देर रात किये गये मेल का आपने जवाब भी दिया था और उस माम्ले मे अपनी बहुमूल्य सलाह भी दी थी।इससे पहले भी मै यंहा के वरिष्ठ(अब स्वर्गीय)वकील अफ़ज़ाल अहमद रिज़वी से सलाह लिया करता था।वे भी मुझे अपने बेटे जैसा ही चाहने लगे थे।उनके जाने के बाद पहली बार मुझे किसी मामले सलाह की ज़रूरत पड़ी तो मैने बिना जान पहचान के आपसे सलाह मांग ली थी।मुझे अच्छा लगा था जब आपका जवाब मिला और आप यकीन करिये उस दिन से मुझे ब्लाग जगत के लोगो से आत्मीय रिश्ते होने का एहसास हुआ है जो आजतक़ जारी है। आप इस परिवार के बुज़ुर्ग है और आपने अरून जी को सलाह अच्छे उद्देश्य से दी थी जिसे उन्होने माना भी।जितना सच ये है उतना ही सच ये भी है कि संयुक्त परिवार मे बहुत से मत सामने आते है और ज़रूरी नही सब एक बात पर सहम्त हो,कुछ लोग बुज़ुर्गो की सलाह को आशिर्वाद मानते है तो कुछ के लिये वो आऊट डेटेड बकवास होती है।ये सब मानने वाले पर निर्भर करता है। आपने बहुत सही किया मेरी व्यक्तिगत रूप से ये अपेक्षा रहेगी कि आप जिसे अपना समझ्ते हैं उस पर अपना स्नेह बनाये रखते हुये सलाह के आशिर्वचनो की वर्षा करते रहेंगे।आपको मै सलाह दे सकू इतना साम्रर्थ्य नही है मुझमे मगर फ़िर भी आपसे निवेदन कर रहा हूं कि इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत नही है।सदेव आपका, अनुज ,अनिल्।

Science Bloggers Association 12 June, 2009 2:31 PM  

वैसे सलाह सम्‍बंधी बातें तो सभी पर लागू होती हैं। जिसे भी बिन मांगे सलाह दें, वह आपको उल्‍लू ही समझेगा।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डॉ. मनोज मिश्र 13 June, 2009 8:15 AM  

आप सही सुझाव देतें हैं ,उचित मार्गदर्शन देतें हैं ,अब इसे कोई कैसे ग्रहण करता है यह अलग बात है .

महेन्द्र मिश्र 13 June, 2009 11:51 AM  

एक ब्लागर जो आम इंसान है वह ब्लागिंग से आई मुसीबतों का सामना करने पर टूट सकता है। इस तथ्य को हम सभी जानते हैं, भले ही इसे स्वीकार करें या न करें..

आपके विचारो से सहमत हूँ . विचारणीय आलेख. आभार.

Abhishek Mishra 16 June, 2009 4:41 PM  

Internet ke badhte upyog aur uspar aane vali chahi-anchahi mails ke daur mein mujhe nahin lagta ki koi bhi vyakti Cyber Crimes ke ullanghan ki pahunch se bahar hai. Aise mein Blogging mein apke jaise ek takniki jaankar ka rahna hamare liye rahat ki baat hi honi chahiye.

नरेश सिह राठौङ 22 June, 2009 4:53 PM  

आपके ब्लोग पर ही मुफ्त सलाह मिल सकती है बाकी लोगो के पास कहा समय है । आपके द्वारा दी गयी सलाह हमारे लिये बहुत काम आने वाली होती है ।

तलाशिए जाल पर , जो चाहें ...

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