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Wednesday 24 June 2009

स्वतंत्रता का मूल अधिकार (2) युक्तियुक्त निर्बंधन

पिछले आलेख में हम ने स्वतंत्रता के मूल अधिकारों के संबंध में युक्तियुक्त निर्बंधनों (Restrictions) की बात की थी। हमें समझना होगा कि ये युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं? और इन की कसौटी क्या हो सकती है?






युक्तियुक्त निर्बंधन

युक्तियुक्त निर्बंधन क्या हैं? यह सदैव ही एक कठिन विषय रहा है। युक्तियुक्तता पर विधायिका (संसद और विधानसभा) के निर्णय अंतिम नहीं हैं। निर्बंधनों की युक्तियुक्तता का निर्धारण करना न्यायालयों का कार्य है। यह युक्तियुक्त शब्द न्यायालय की पुनर्विलोकन की शक्ति को बहुत विस्तृत कर देता है। लेकिन युक्तियुक्तता को जाँचने के लिए कोई निर्धारित कसौटी भी नहीं है और इस का निर्णय सदैव ही परिस्थितियों के आधार पर किया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों से कुछ सामान्य सिद्धांत स्थापित हुए हैं जिन के आधार पर युक्तियुक्तता की जाँच की जाती है।

युक्तियुक्तता के सामान्य स्थापित सिद्धांत

  1. युक्तियुक्तता पर अंतिम निर्णय देने की शक्ति न्यायालय की है न कि विधायिका की।
  2. नागरिकों के अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन न्यायपूर्ण और सामान्य जनता के हित में होने चाहिए, उस से अधिक नहीं। वैयक्तिक हित और सामाजिक हितों में सामंजस्य का प्रयास होना चाहिए। लगाए गए निर्बंधन और उस के उद्देश्य में सामंजस्य रहे और उन में तर्कसंगत संबंध हों। यदि विधि स्वैच्छाचारी और आवश्यक से अधिक निर्बंधन के संबंध में कोई विधि बनाती है तो उसे अवैध घोषित करने का अधिकार न्यायालय को है।

  3. युक्तियुक्तता का कोई सामान्य आधार नहीं हो सकता। प्रत्येक मामले की परिस्थतियों और तथ्यों पर वह निर्भर करेगा। यह मानदंड उस अधिकार की प्रकृति जिस पर निर्बंधन लाया जा रहा है, लगाए गए निर्बंधन के अन्तर्निहीत प्रयोजन, बुराई की मात्रा, उसे दूर करने की अनिवार्यता,निर्बंधन लगाने के अनुपात में भिन्नता और समकालीन परिस्थितियों के अनुरूप बदलता रहता है। न्यायिक निर्णय के लिए इन सब बिन्दुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है।
  4. लगाए जा रहे निर्बंधनों को मौलिक विधि और प्रक्रियात्मक विधि दोनों दृष्टिकोण से युक्तिपूर्ण होना आवश्यक है। इस कारण से न्यायालय को निर्बंधनों की अवधि और मात्रा ही नहीं उन की परिस्थितियों और उन्हें लागू करने के लिए प्राधिकृत किए गए तरीके पर भी विचार करना चाहिए।
  5. राज्य की नीति निर्देशक तत्वों में निहीत उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए लगाए गए निर्बंधन युक्तियुक्त माने जा सकते हैं।
  6. जब न्यायालय किसी निर्बंधन की युक्तियुक्तता पर विचार करें तो उन का दृष्टिकोण वस्तुनिष्ठ (Objective) होना चाहिए न कि व्यक्तिनिष्ठ (Subjective)। युक्तियुक्तता का मानदंड एक औसत विवेकशील व्यक्ति के जैसा होना चाहिए और न्यायाधीश की व्यक्तिगत सामाजिक, आर्थिक विचारधारा से प्रेरित नहीं होना चाहिए। न्यायाधीशों को दायित्व की भावना और आत्मनियंत्रण से काम लेना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि संविधान केवल उन की विचारधारा वाले व्यक्तियों के लिए नहीं बनाया गया है, अपितु सभी के लिए, और जनता के प्रतिनिधियों ने निर्बंधनों को युक्तियुक्त मानकर ही लगाया होगा।
  7. अनुच्छेद 19(1) में दिए गए अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन केवल अनुच्छेद 19(2) से 19(6) तक में वर्णित आधारों पर ही लगाए जा सकते हैं। अन्य किसी आधार पर लगाए गए निर्बंधन अवैसंवैधानिक होंगे।
  8. न्यायालय कानून की युक्तियुक्तता का निर्धारण नहीं कर सकते उन्हें केवल यह देखना है कि नागरिक अधिकारों पर लगाए गए निर्बंधन युक्तियुक्त हैं या नहीं।
  9. निर्बंधन निषेधात्मक भी हो सकते हैं। कुछ विशेष मामलों में नागरिकों के पूर्ण अधिकार पर रोक लगाने के निर्बंधन भी युक्तियुक्त हो सकते हैं। खतरनाक व्यापारों और उत्पादनों पर रोक लगाना जैसे, शराब, नशीले पौधे उगाना, औरतों का क्रय विक्रय करना आदि युक्तियुक्त निर्बंधन हैं। प्रत्येक नागरिक को विधिपूर्ण वाणिज्य का पूरा अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का प्रयोग उसे युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन ही करना होगा। उस पर ऐसे निर्बंधन लगाए जा सकते हैं जिसे सरकार समाज की सुरक्षा, शान्ति-व्यवस्था एवं नैतिकता इत्यादि के लिए आवश्यक समझती है।
अगले आलेख में हम अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता पर चर्चा करेंगे। ........ (क्रमशः)

5 टिप्पणियाँ:

ताऊ रामपुरिया 24 June, 2009 9:41 AM  

बहुत काम की जानकारी. धन्यवाद.

रामराम.

राज भाटिय़ा 24 June, 2009 2:18 PM  

अच्छी जानकारी है
धन्यवाद

Udan Tashtari 24 June, 2009 6:25 PM  

आभार इस जानकारी के लिए.

अभिषेक ओझा 25 June, 2009 12:13 AM  

हम्म... डिटेल में जान रहे हैं... हम भी.

डॉ. मनोज मिश्र 25 June, 2009 11:10 PM  

बेहतरीन शुरुआत .

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