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Sunday 21 June 2009

अदालत क्या करे? 1500 से अधिक मुकदमे अन्तिम बहस में

बाल श्रम उन्मूलन पर हुई परिचर्चा के दिन ही श्रम न्यायालय, कोटा की जज साहिबा से बात हुई थी।  वे बता रही थीं कि अदालत में साढ़े चार हजार मुकदमे लंबित हैं।  1500 से अधिक मुकदमें तो अन्तिम बहस में लगे हैं।  रोज कम से कम 20 से 25 मुकदमे बहस के लिए लगते हैं।  केवल बहस ही सुनी जाए तो अदालत के दिन भर के समय में केवल तीन या चार मुकदमों में बहस सुनी जा सकती है। यदि उन में उसी दिन निर्णय भी लिखाना हो तो अधिक से अधिक दो मुकदमे निपटाए जा सकते हैं।  ऐसे में अन्य मुकदमों में जो गवाहियाँ और  मुकदमों के बीच में प्रक्रिया संबंधी बिन्दुओं पर होने वाली बहसें तो सभी मुल्तवी करनी पड़ेगी। तब जा कर एक दिन में अधिक से अधिक तीन-चार निर्णय किए जा सकते हैं।  कुल 70 से अस्सी मुकदमे रोज की सूची में रखने पड़ रहे हैं।  यह हालत तो तब है, जब मुकदमों में अगली पेशी तीन से छह माह की दी जा रही है।  अन्तिम बहस के लिए सूची में रखे मुकदमों में से 18-20 में रोज केवल पेशी बदलनी पड़ रही है। पेशी बदलने पर मुवक्किल और वकील बहुत जद्दोजहद करते हैं। जल्दी लगाने को कहते हैं।  लेकिन अदालत जल्दी लगा नहीं सकती। जितने अधिक मुकदमे रोज लगेंगे उतने ही रोज बदलने पड़ेंगे। अदालत का दो ढ़ाई घंटे का समय इस पेशी बदलने की जद्दोजहद में बरबाद हो रहा है।  बस एक ही इलाज नजर आता है कि सरकार कम से कम एक श्रम न्यायालय कोटा में और खोल दे।  दूसरा रास्ता यह है कि न्याय चाहने वाला थक हार कर खुद ही अपना मुकदमा अदालत से वापस ले ले।

मेरी डायरी  बता रही थी कि गुरुवार को कुल 12 मुकदमे श्रम न्यायालय में अन्तिम बहस के लिए मुकर्रर हैं।  इन में से नौ कोटा ताप विद्युत परियोजना  के उन श्रमिकों के थे जिन्हें परियोजना के पहले ही बिजलीघर के आरंभ होने के समय नियोजित कर लिया गया था। अनेक वर्षों तक इन की नियुक्ति को नियमित न कर दैनिक वेतन पर काम लिया गया।  करीब आठ वर्षों के उपरांत उन्हें नियमित किया गया।  उन की मांग थी कि वे ही थे जिन्हों ने इस बिजलीघर को सब से पहले आरंभ किया।  इस लिए उन्हें उसी तिथि से नियमित किया जाना चाहिए जब उन्हें बिजलीघर में काम करते दो वर्ष पूरे हो गए थे। ये मुकदमे 1997-98 से  इसी अदालत में चल रहे हैं।  लगभग पाँच वर्ष पूर्व ही इन में गवाही ली जा चुकी है और तभी से ये अन्तिम बहस में चल रहे हैं।  अभी तक किसी भी जज ने इन में बहस पूरी करने का प्रयास नहीं किया।  सभी मुकदमों में विधि का एक ही बिन्दु है जिस से इन की सुनवाई एक साथ की जा सकती है।

उक्त  मुकदमों के अतिरिक्त तीन मुकदमे कोटा की बंद हो चुकी जे. के. सिंथेटिक्स लि. के उद्योगों से सम्बन्धित हैं। ये तीनों मुकदमे अवैधानिक सेवा समाप्ति के मुकदमे हैं।  जो 1991-93 से चल रहे हैं।

मैं इन बारह मुकदमों का अध्ययन कर अदालत पहुँचा कि यदि इन  में से दो-तीन मुकदमे भी सुने जा सके तो मेरी अलमारी में कुछ स्थान बनेगा।  लेकिन जब मैं अदालत पहुँचा तो अदालत विरोधी वकीलों को बुलवा कर उन से पूछ रही थी कि क्या इन मुकदमों में कोई समझौता नहीं हो सकता?  वकील अपने  उद्योगपति मुवक्किलों की गरीबी का बखान करते हुए तर्क दे रहे थे कि समझौता संभव नहीं है।  मैं ने अदालत से अनुरोध किया कि इन मुकदमों में इस अदालत में अब तक पीठासीन रहे सभी जज इस तरह का प्रयास कर चुके हैं।  इन में समझौता संभव नहीं है। यदि होना होता तो अब तक कभी का हो चुका होता। अदालत  ने अपने काम की अधिकता के सांख्यिकी बताना आरंभ कर दिया।  बताया गया कि कम से कम पच्चीस मुकदमे बहस के लिए लगे हैं और अदालत आज इन मुकदमों में बहस के लिए पूर्व तैयारी नहीं कर सकी है। इस कारण से आज इन मुकदमों को नहीं सुन सकेगी।  मैं ने बहुत कहा कि मैं इन सब मुकदमों में तैयार हो कर आया हूँ।  इन्हें देखने में घंटों खर्च किए हैं।  लेकिन सारे तर्क बेकार गए।  सभी मुकदमों की सुनवाई मुल्तवी कर दी गई और सब में अक्टूबर माह में पेशी नियत कर दी गई।  बीच में पूरे चार माह हैं।  चार माह में बारह मुकदमों की तफसील याद रखना संभव नहीं।  मुझे इन मुकदमों में फिर से बहस की तारीख के ठीक पहले घंटों तैयारी करना होगा। जो मैं पहले ही कम से कम चार बार कर चुका हूँ।  मेरी चार बार की तैयारी तो बेगार हो चुकी है।  अगली पेशी के लिए जो तैयारी करूंगा वह बेगार नहीं होगी उस का विश्वास मैं कर पाने में असमर्थ हूँ।

 इस समस्या का एक ही इलाज है कि इस अदालत के मुकदमों के निपटारे के लिए कम से कम एक अतिरिक्त अदालत की और स्थापना हो और वहाँ केवल अंतिम बहस के सब से पुराने पाँच सौ मुकदमे स्थानान्तरित कर दिए जाएँ। जब उन में से आधों का निपटारा हो चुके तो फिर से ढाई सौ मुकदमे अंतिम बहस के लिए उस अदालत में स्थानांतरित कर दिए जाएँ।  नई अदालत को सभी वे साधन और सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ जो शीघ्र मुकदमों के निपटारे के लिए जरूरी हैं।  इस के अलावा यह भी कि राज्य सरकार इस अदालत के लिए ऐसे सक्षम जज की नियुक्ति के लिए उच्च-न्यायालय को लिखे जिस का इस तरह के मुकदमों के निपटारे का रिकॉर्ड अच्छा हो।  इस के लिए इस अदालत में पैरवी करने वाले सभी अभिभाषक  अपनी अभिभाषक परिषद और बार कौंसिल को सक्रिय हो कर राज्य सरकार पर दबाव बनाने के लिए कह रहे हैं।  साथ ही यह भी प्रयास है कि वे मुवक्किल जो न्याय चाहते हैं वे भी इस काम में अपना सहयोग करें।  अन्तिम रूप से हानि तो सब से अधिक उन की ही हो रही है।

10 टिप्पणियाँ:

Kashif Arif 21 June, 2009 7:02 AM  

दिनेशराय जी, मैं आपकी बात से पुरी तरह सहमत हूं। जब तक हम खुद कुछ नही करेंगे तब तक इस देश का कुछ नही होगा।

Bhuwan 21 June, 2009 7:39 AM  

अहर रोज़ न जाने कितने मुक़दमे दर्ज कराये जाते है... अदालत भी क्या करे...

भुवन वेणु
लूज़ शंटिंग

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 21 June, 2009 7:43 AM  

दोष अदालत का नहीं। दोष सरकारों का है जो बढ़ती जनसंख्या के मुकाबिल समय रहते पर्याप्त संख्या में अदालतें स्थापित नहीं कर सकीं।

डॉ. मनोज मिश्र 21 June, 2009 8:57 AM  

कुछ ठोस निर्णय लेने होंगे और वह भी तुरंत .

●๋• सैयद | Syed ●๋• 21 June, 2009 10:09 AM  

बस सरकारी इच्छाशक्ति की कमी लगती है.

काजल कुमार Kajal Kumar 21 June, 2009 4:07 PM  

इस देश में सरकारें तब तक नहीं जागतीं जब तक पानी सर से न गुजरने लगे. बहुत पहले हम pendency के आंकडे यूं याद रखते थे:
सर्वोच्च न्यायालय= 2 लाख
उच्च न्यायालय= 20 लाख
बाक़ी न्यायालय= 2 करोड़
शायद अब ये 2 का अंक, 3/ 4/ 5 कुछ भी हो सकता है. किसे परवाह है. ये बस एक अंक भर रह गया है.
लेकिन, ऐसा ही चलता रहा तो लोग अदालतों के बाहर ही अपने आप निपटने की प्रक्रिया अपनाने लगेंगे, जिसे हम लोग पंचायती / कबाइली न्याय व्यवस्था के नाम से जानते हैं. रही सही कसर, थानों में ही कुछ ले दे कर निपटा लेने की प्रवृत्ति है.

पाकिस्तान के स्वात में तालिबानियों के वर्चस्व का मुख्य कारण, प्रसाशन द्वारा वहां न्याय व्यवस्था उपलब्ध न करा पाना ही था. जिसका फ़ायदा तालिबान ने यह कह कर उठाया कि वे लोगों को इस्लामी न्याय देंगे. क्या हमारे देश की व्यवस्था इस प्रस्तरयुगीन / मध्ययुगीन न्याय व्यवस्था के लिए तैयार है ?

राज भाटिय़ा 21 June, 2009 4:11 PM  

ओर हम भी तो छोटी छोटी बातो पर मुकद्दमा दायर कर देते है, पहले हम जिस जगह रहते थे, हमारी मोहल्ले की अपनी एक पंचायत होती थी जिस मै हमारे घरो के सारे मसले बेठ कर हल होते थे, ओर कोई भी लडाई झगडा होता तो वही फ़ेसला भी होता था, आज ऎसा क्यो नही ?
इस से हमारा समय, पेसा ओर इज्जत भी बचती है,
दिनेश जी आप ने लेख मै जो बाते लिखी सभी बातो से सहमत है.
धन्यवाद
मुझे शिकायत है
पराया देश
छोटी छोटी बातें
नन्हे मुन्हे

लोकेश Lokesh 21 June, 2009 10:35 PM  

अदालतें खुल जायेंगी तो जजों की पोस्टिंग नहीं होगी, नतीज़ा वही ;-)

Dileepraaj Nagpal 23 June, 2009 12:36 AM  

Jeewan Me EK Baar Adalat K Cakker Lgane Pade The. Mahsoos Kiya Tha Ki Samay Beet Jaane K Baad Agar Nyay Mila Bhi To Wo Kisi Kaam Ka Nahi Hoga. Us Din Sharm Mahsoos Hui Thi Ki Nyay Na Milne Ke Karan Majbooran Samjhoota Karna Pada.

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