Custom Search

Tuesday, 8 April, 2008

बेचारगी न्यायपालिका की

 जनता के संगठनों को सामने आना होगा

'तीसरा खंबा' अपने जन्म से ही लगातार इस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है कि भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या इस का छोटा होना है। इसे भारतीय जन-गण का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इस देश की न्याय पालिका का आकार देश की आवश्यकताओं के अनुसार तय नहीं होता है अपितु केन्द्र और राज्य सरकारों की इच्छा के अनुसार निश्चित होता है। जिस का मतलब यह हुआ कि सत्तासीन दल यह तय करेगा कि न्यायपालिका का आकार क्या हो?

हमारे यहाँ सत्ता में आए राजनीतिक दलों और उन के शीर्ष कर्ताधर्ताओं की नीयत के बारे में किसी को कोई शक की गुंजाइश अब नहीं रह गई है कि वे देश और जनता की आवश्यकता के बारे में तभी सोचते हैं जब कि उन के सामने कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा हो और जिसे दबाने या कुचलने की गुँजाइश पूरी तरह समाप्त हो गई हो। वे सामान्य तौर पर अपने और अपने दल के हितों से ही देश को संचालित करते रहे हैं। अब न्याय की जरुरत हमेशा उसे होती है जिस के साथ अन्याय हो रहा है जो कमजोर है। शक्ति संपन्न को न्याय की आवश्यकता नहीं होती। क्यों कि वह खुद ही तो अन्याय करने वाला है। राजनैतिक दलों और व्यक्तियों के विरुद्ध जब भी कुछ न्याय पालिका के पास निर्णय के लिए पहुँचता है तो उन की चाहत यही होती है कि न्याय जितने विलम्ब से हो उतना अच्छा। इस कारण से उन की चाहत भी यही रहेगी कि अदालतें संख्या में कम हों और न्याय में जितनी देरी से हो सकती हो होती रहे। वे क्यों अदालतों की संख्या बढ़ाने में रुचि लेने लगे।

 आप अदालत चिट्ठे के इस समाचार (क़ानून मंत्री अदालतों की संख्या बढ़ाने के खिलाफ!?) को पढ़ें तो आप को राजनितिज्ञों की नीयत का पता लग जाएगा। हरियाणा को पृथक राज्य का दर्जा प्राप्त हुए दशक बीत चुके हैं लेकिन आज तक उसे अपना उच्च न्यायालय नसीब नहीं हुआ। खुद इस के लिए माँग उठाने वाले जब कानून मंत्री बन जाते हैं तो कहने लगते हैं- (कोई जरूरत नहीं है हाईकोर्ट की: क़ानून मंत्री)

हमारी न्यायपालिका के मुखिया (मुख्य न्यायाधीश) अब तक तो दबी जुबान से ही कहा करते थे कि हमारे यहाँ न्यायालयों की संख्या कम है। लेकिन अब जब कि न्याय में देरी को सीधे-सीधे न्यायपालिका और न्यायाधीशों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा है तो उन्हें भी अपनी बात को खुल कर कहना पड़ रहा है। अदालत की इस पोस्ट को देखिए- (देश में और ज्यादा अदालतों की जरूरत : मुख्य न्यायाधीश)

हालाँकि न्यायपालिका खुद भी मुकदमों के बोझे से इतनी दबी है कि वह कभी जनता से भी गुहार करती है कि- (जनता ख़ुद समस्याएं सुलझाए, कोर्ट हर समस्या का हल नहीं: सुप्रीमकोर्ट) और (अदालतों के चक्कर लगाने से बचिए: मुख्य न्यायाधीश)

अंत में इस समाचार को भी देखिए-(वो मारा!: आपसी मुकद्दमा? समझौता कीजिए)

अब तो आप सहमत होंगे कि हमारी सरकारे और राजनेता नहीं चाहते कि आप को यानी जनता को न्याय मिले। लेकिन केवल सहमत होने से काम नहीं चल सकता। इस मामले में जनता के बीच जागरुकता उत्पन्न करनी होगी। जनता को जाग्रत करने का काम नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जनता के संगठनों को सामने आना होगा।

7 टिप्पणियाँ:

अनूप शुक्ल 8 April, 2008 7:24 AM  

भारत में अदालतें कम हैं। न्याय देर से मिलता है।

Gyandutt Pandey 8 April, 2008 7:29 AM  

कोई काम कराना हो तो पोलिटिकल सिस्टम को मैनीप्यूलेट करना आना चाहिये। यह काम तो न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को सीखना पड़ेगा। देश की आजादी में वकीलों की महत भूमिका रही है। वैसी ही उच्च स्तरीय भूमिका की अपेक्षा है।

Udan Tashtari 8 April, 2008 10:10 AM  

बिल्कुल सहमत हैं.

राज भाटिय़ा 8 April, 2008 12:02 PM  

हम भी सहमत हे आप के विचारो से.

mahendra mishra 8 April, 2008 7:19 PM  

न्याय पालिका का क्षेत्र कम होने के कारण लोगो को समय पर निर्णय नही मिल पाता है और खेद का विषय तो यह कि न्याय व्यवस्था कार्यपालिका पर अवलम्बित और निर्भर है जिसकी मंशा से न्याय पालिका का कार प्रकार सुनिश्चित्त किया जाता है . अपने विचारणीय प्रश्न उठाया है धन्यवाद

someshwar 15 April, 2009 8:45 AM  

मात्र अदालतॊ की सख्या बढ जाने से समस्या हल नही हो सकती, इसके लिये न्यायिक प्रक्रिया मे सुधार तथा वकिलॊ द्वारा सहयोग भी अपेक्शित हॆ

ajay kumar jha 15 April, 2009 5:12 PM  

dinesh bhai, samasyaa utnee aasaan nahin hai aapne bilkut theek kaha hai,yahan ek baat aur dhyaan dila doon ki abhee sarkaar ne sarvochch nyaayaalay ke chaar nyaayaadheeshon ko isliye kaaryabhaar nahin saunpaa kyunki unke liye nirdhaaarit bangle khaalee nahin hain. magar ek baat bataiye aap wakeel log jab crpc mein koi sakaaratmak badlaav hota hai use bhee kyun nahin maante , baharhaal samasyaa tohai hee....

  © Blogger template Newspaper III by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP