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Sunday, 10 February, 2008

अदालतों की संख्या बढ़ने के असर

पिछली कड़ी में हम ने देखा था कि हमारे देश में दस लाख की जनसंख्या पर मात्र 10.9 जज हैं और एक जज के पीछे वकीलों की संख्या 66 है। अगर जजों की संख्या 12,000 से पाँच गुना बढ़ा कर अर्थात 60,000 कर दी जाए तो वकीलों की संख्या तुरंत ही एक जज पर छियासठ (66) से घट कर केवल तेरह दशमलव तीन (13.3) रह जाएगी जो बिलकुल न्याय संगत होगी।

अब आगे पढ़ें.........

अगर अदालतों की संख्या पाँच गुना की जाती है तो उस के क्या क्या असर होंगे?

1. सब से पहला असर तो यह होगा कि अदालतों में मुकदमों की संख्या पाँच सौ से सात सौ के आस पास रह जाएगी जो मैनेजेबल होगी। महिने में कम से कम एक कभी-कभी दो और साल में कम से कम पन्द्रह सुनवाइयाँ होने लगेंगी। मुकदमे की उम्र 10-12 साल से घट कर दो-ढाई साल रह जाएगी।

2. दूसरा असर यह होगा कि गवाह नदारद नहीं होंगे और विस्मृति के कारण सबूत खो जाने का अन्देशा कम होने से अपराधिक मामलों में सजा की दर बढ़ जाएगी। बेगुनाह लोग जल्दी बरी होंगे।

3. तीसरे जज की निगाह और स्मृति में हर मुकदमा होगा। जिस से निर्णयों की गुणवत्ता बढ़ेगी। न्याय जल्दी मिलने से अदालतों पर से उठता विश्वास पुनः कायम होने लगेगा।

4. चौथे, वर्तमान में सीनियर और नामी वकीलों की डायरियाँ मुकदमों से भरी पड़ी रहती हैं। उन के पास उन की कार्य़ क्षमता से काफी अधिक मुकदमे हैं। यह इसलिए चल रहा है क्यों कि अदालतों में रोज जितने मुकदमे रोज सुनवाई के लिए लगते हैं मुकदमें अधिक और अदालतें कम होने के कारण उन में से पाँचवें हिस्से के मुकदमों की ही सुनवाई हो पाती है, शेष में तारीखें बदल जाती हैं। अगर अदालतें पाँच गुना हो जाएं तो आधे से अधिक मुकदमों में कार्यवाही होने लगेगी। व्यस्त वकील उतना काम नहीं कर पाएंगे और उन्हें काम छोड़ना पड़ेगा जो उन वकीलों को मिलेगा जिन के पास काम नहीं है या कम है। इस से वकीलों में काम का वितरण अधिक होगा।

5. पांचवें, यह सोचा जा सकता है कि सीनियर और व्यस्त वकील की आय इस से कम हो जाएगी। पर यह सोच गलत है। उन की डायरी में मुकदमों की संख्या जरुर घटेगी लेकिन मुकदमे जल्दी निर्णय होने के कारण वे जल्दी ही नए मुकदमें ले सकने की स्थिति में होंगे और उन की आय में कमी होने के बजाय बढ़ोतरी होगी।

6. छठे, एक अदालत औसतन एक दिन में दो मुकदमों में भी फैसले करती हो (जो लगभग नामुकिन बात है) तो साल में चार सौ मुकदमों में फैसले होंगे। नहीं कर सकती। हम यह मान कर चलें कि एक मुकदमे में दो वकील तो होंगे ही (हालाँकि अपराधिक मामलों में एक ही वकील से काम चल जाता है) तो एक वकील के हिस्से में अधिक से अधिक बारह मुकदमे आऐँगे। एक मुकदमे में एक वकील को औसतन पाँच हजार रुपए की आय भी हो तो भी उसे साल में मात्र साठ हजार रुपए की आय होती है और माह में केवल पाँच हजार मात्र। एक वकील की इस आय को उचित नहीं कहा जा सकता।

(यहाँ आप यह कह सकते हैं कि यह आँकड़ों की हेराफेरी है। वकील इससे बहुत अधिक कमा रहा है। यह सही भी है कि कुल संख्या के 50 प्रतिशत वकीलों की आय इस से अधिक है। लेकिन, शेष आधे? वे कहाँ टिकेंगे ? यह भी सही है कि देश में लाखों वकील ऐसे भी हैं जो कि रोज अदालत आने जाने का खर्च भी जेब से उठाते हैं। और वकीलों की औसत आय काल्पनिक आय के इस आँकड़े की दोगुनी भी नहीं है। यहाँ जो आँकड़े मै ने प्रस्तुत किए हैं वे इस गणित पर आधारित अनुमानित हैं कि एक अदालत कितने फैसले करती है। लेकिन अदालत तक आने वाले मुकदमों की संख्या इससे कई गुना है, उनमें से अधिकांश लम्बित हो कर रह जाते हैं। कम से कम आधी से अधिक फीस तो इन मुकदमों में भी वकीलों को मिलती ही है। इस कारण यह कहना सच है कि वकीलों की आय इस से अधिक है। फिर भी यह आंकड़े सच के नज़दीक ही हैं, बहुत दूर नहीं।)

7. सातवें, अदालतों की संख्या के पाँच गुना बढ़ा दिए जाने पर एक वकील के अन्तिम निर्णय तक पहुँचने वाले मुकदंमों की संख्या भी बढ़ेगी और उन की औसत आय भी इतनी ही बढ़ेगी अर्थात पाँच से बढ़ कर पच्चीस हजार तक जा सकती है और इस आय को संतोषजनक कहा जा सकेगा।

8. आठवें, अभी एक मुकदमा दस साल चलता है तो दस साल तक अदालत तक आने जाने और विविध खर्चों में ही न्यायार्थी को इतना व्यय करना पड़ जाता है कि वह वकील को दी जाने वाली फीस का कई गुना हो जाता है। मुकदमें में दस के स्थान पर दो वर्ष में निर्णय होने लगने पर इन खर्चों में भारी कमी आएगी और इस से न केवल न्यायार्थी को लाभ होगा अपितु वकीलों की फीस में भी व़ृद्धि होगी। इस का उदाहरण फास्ट ट्रेक न्यायालयों में देखने को मिल रहा है जहाँ मुकदमों के निर्णय जल्दी होने लगे हैं और वकीलों की फीस भी बढ़ी है।

9. नवें, जब तीसरा खंबा प्रारंभ हुआ ही था तब इस तरह की बहुत प्रतिक्रियाऐं आयी थीं कि बहुत से लोग इसीलिए मुकदमे नहीं करते कि उन के फैसले होते ही नहीं हैं। यह बात सही भी है। आज भी कम से कम एक तिहाई गैर अपराधिक मुकदमें ऐसे हैं जो कि अदालतों तक पहुँचते ही नहीं हैं। जब न्याय होने लगेगा तो ये मुकदमे भी अदालतों तक पहुँचने लगेंगे। इस से भी वकीलों को मिलने वाले काम में बढ़ोतरी होगी।

10. दसवें, अभी सरकार ने अदालतों में पहुँचने वाले मुकदमों की संख्या को कम रखने के लिए पुलिस विभाग को निर्देश दे रखे हैं कि अपराध की शिकायत आने पर शिकायतकर्ता और अपराध करने वालों के बीच एफआईआर दर्ज करने के पहले ही समझौता करा दिया जाए। पुलिस यह सब फरियादी को एफआईआर दर्ज कराने के कष्टों और मुसीबतों से डरा कर कराती है। जिस से पुलिस वालों को अपराधियों से पैसा बनाने का अवसर भी प्राप्त होता है और अपराधियों के हौंसले भी बढ़ते हैं। अपराध होने की दर भी बढ़ती है। अदालतों पर काम का बोझ कम होने पर इस स्थिति में सुधार होगा और अधिक अपराधिक मुकदमे अदालतों में आएंगे। जिस से भी वकीलों की आय में बढ़ोतरी होगी।

यहाँ बिन्दुवार और भी अधिक असर गिनाए जा सकते हैं पर नतीजे यही सामने आएंगे कि-

क. मुकदमे जल्दी निपटेंगे, न्याय की गुणवत्ता बढ़ेगी और न्याय पर विश्वास बढ़ेगा।

ख. वकीलों के पास काम बढ़ेगा, उन की आय भी बढ़ेगी।

ग. अपराधियों में भय बढ़ेगा, अपराधों की संख्या घटेगी।

इस तरह हम देखते हैं कि अदालतों की संख्या बढ़ाने में फायदे ही फायदे हैं। लेकिन अदालतों की संख्या कैसे बढ़े?

यह जानने के लिए पढ़ते रहें तीसरा खंबा। इस के आगामी आलेख इसी विषय पर होंगे।

3 टिप्पणियाँ:

ALOK PURANIK 10 February, 2008 8:12 AM  

बहुत सही। सटीक विश्लेषण।
हम तो जी एक बार ही अदालत गये थे,वहां से पांच विषय निकले थे व्यंग्य के। पर एक भी ना लिखा,कोर्ट की अवमानना के डर से।

Gyandutt Pandey 10 February, 2008 12:00 PM  

कचहरी का मामला अपने पर हो तो रुदन और करुणा का होगा, पर मात्र दर्शक होँ तो व्यंग जरूर निकाला जा सकता है!
आपने जो नतीजे निकाले हैँ - वे तर्कसँगत प्रतीत होते हैँ। हाँ, कुछ सॉफ्टवेयर के प्रकरण - मसलन नैतिकता और ईमानदारी को भी टेकल करना होगा।

mamta 10 February, 2008 8:10 PM  

पर हम यहां आपसे थोडा असहमत है । अदालतों की संख्या बढेगी तो इसका मतलब ये नही है कि सब कुछ इतना आसान हो जाएगा। बात फिर भी वहीं कि वहीं रहेगी हाँ थोडा -बहुत फर्क पड़ सकता है।जरुरत है तो वकीलों और न्यायधीशों को अपना नजरिया बदलने की। यानी तारीख पर तारीख वाला सिस्टम कम करने की।

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