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Friday 13 November 2009

498-ए के मामले अब अन्वेषण के बाद ही दर्ज होंगे, केन्द्र सरकार का निर्देश

भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए महिलाओं पर पति या उस के नातेदारों द्वारा क्रूरता पूर्ण व्यवहार के संबंध में है। लेकिन यह देखने में आया है कि इस धारा के अंतर्गत दर्ज अपराधों में अधिकांश फर्जी पाए जाते हैं। लेकिन पुलिस रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम दर्ज होते हैं सभी को पुलिस गिरफ्तार कर लेती है और धन वसूलने के लिए उस का उपयोग करती है। बाद में होता यह है कि केवल पति या नजदीकी संबंधियों के विरुद्ध ही आरोप पत्र दाखिल होता है। उन में से भी अधिकांश के विरुद्ध आरोप साबित नहीं हो पाते हैं। इस तरह बहुत से लोगों को नाजायज परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसे लोगों को केन्द्र सरकार के निर्देश से राहत मिल सकती है कि धारा 498-ए के मामलों में यह धारा अन्वेषण में इसे साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर ही लगाई जाए, पहले नहीं।

दैनिक भास्कर कुरुक्षेत्र ने समाचार (दहेज में अटक जाते हैं रिश्ते)  है कि केन्द्र सरकार ने इस तरह का निर्देश जारी किया है कि इस तरह के मामलों में अन्वेषण किया जाए और धारा 498-ए के लिए पर्याप्त सबूत मिल जाने पर ही मामले में धारा 4987-ए के अनुसार कार्यवाही की जाए। अभी हालत यह है कि देश भर में वर्ष में 70 हजार मामले इस धारा के अंतर्गत दर्ज किए जाते हैं। प्रतिदिन अनेक  निर्दोष वरिष्ठ नागरिक, महिला और बच्चे इस धारा के अंतर्गत गिरफ्तार किए जाते हैं। केन्द्र सरकार के इस निर्देश के उपरांत इस तरह के मामलों में कमी आएगी और निर्दोष लोग इस का शिकार होने से बचेंगे। इस कानून की जो बदनामी हुई है वह भी कम हो सकेगी।
वास्तविकता यह है कि देश में ऐसी विश्वसनीय संस्थाओं की बहुत कमी है जो वैवाहिक मामलों में दोनों पक्षों को बुला कर उन के बीच के विवाद को समझने का प्रयत्न करें और उन की समझाइश के माध्यम से विवादों को हल करें। सरकारों ने पुलिस विभाग के अंतर्गत इस तरह के समझौता केंद्र चला रखे हैं वहाँ इस काम को करने वाले विशेषज्ञों के न होने के कारण उन का लाभ नहीं मिलता है, अन्यथा अधिकांश पारिवारिक विवाद काउंसलिंग के माध्यम से हल किए जा सकते हैं।

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Tuesday 10 November 2009

सब से ऊपर थैली का राज .....


मारा प्यारा भारत एक गणतंत्र है, जिस में जनतंत्र है। कानून का राज है। बड़े लोग संविधान बना गए, वह सब से बड़ा कानून है। कह भी गए कि चाहो तो निर्धारित रीति से उस में संशोधन भी कर सकते हो। सारे कानून संविधान के अधीन हैं। जनता विधान सभा चुनती है, जनता संसद चुनती है। विधान सभा और संसद कानून बनाते हैं। कानून को लागू करने का काम सरकार का है। वह इस के लिए जुदा-जुदा महकमे चलाती है। एक सरकार से काम नहीं चलता इस लिए केन्द्र में अलग और राज्यों में अलग सरकारें हैं। राज्य की सरकार से काम नहीं चलता इस लिए नगर निगम, पालिकाएँ और ग्राम पंचायतें हैं। इन्हें भी कानून बनाने और चलाने का हक कुछ हद तक मिला है।

कानून बहस के बाद बनता है। बहुत बहस होती है। इधर चौथा खंबा भी उस पर बहस करने लगता है। कानून पास होने के पहले बहुत से बवाल भी होते हैं। कुछ कानून ऐसे भी हैं कि जिन पर कोई बवाल नहीं होता। वे चुपचाप पारित हो जाते हैं।  कई सांसदों और विधायकों को तो पता नहीं लगता क्यो कि वे सदन में नहीं होते। कइयों को सदन में होते हुए पता नहीं लगता (शायद तब नींद घेर लेती है)। जो वहाँ जागते होते हैं। कई बार उन को पता नहीं होता कि कानून जो उन्हों ने पारित किया है उस का मतलब क्या है। मतलब बताने का काम ऊँची अदालत का है। उसे इस बात की शक्ति मिली है कि वह उसे पढ़े और सब को बताए कि कानून का मतलब क्या है?

दालत भले ही कानून का मतलब बताती हो, उस की उस के पास शक्ति हो लेकिन उस पर पाबंदी है कि वह खुद पढ़ कर नहीं बता सकती कि कानून का क्या मतलब है? उस के लिए उस के पास किसी न किसी की दरख्वास्त होना चाहिए। चाहे तो सरकार की और चाहे तो किसी और की। दरख्वास्त पर वह वकीलों की बहस सुनती है और अपना फैसला दे देती है। अब कानून को सरकार न माने, या न मनवाए तो अदालत के पास जा सकते हैं। वह सरकार को मानने का हुक्म दे सकती है। सरकार को मानना पड़ता है। इस तरह शासन कानून का चलता है।

तो हमारे भारत देश में जनता का राज है और जनता के लिए है। अदालत इस में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। वह न हो तो कानून का कोई भी, कोई मतलब निकाले। चाहे तो सरकार, चाहे तो अफसर, चाहे तो जनता, चाहे तो थैली और चाहे तो गुंडे।  बस अड़चन है तो अदालत है। जब अपने वाला मतलब निकालना हो तो हर कोई चाहता है कि अदालत न हो। जब दूसरा अपने वाला मतलब निकाल रहा हो तो चाहता है कि अदालत हो, वह भी फास्ट ट्रेक हो।
देश की आबादी बढ़ रही है, देश में अदालतें भी बढ़ रही हैं। आबादी बढ़ती है एक की दो, दो की चार, चार की सोलह और सोलह की ..........., लेकिन अदालतें बढ़ती हैं एक की दो, दो की तीन, तीन की चार और चार की .....।
कानून के मुताबिक सब को अदालत में हक के लिए जाने का हक है। जाएँ अदालत में जिन का हक मारा गया हो। अदालत फैसला करेगी। आप के पक्ष में करे तो ठीक, नहीं तो बड़ी अदालत में जाइए। वह भी न करे तो और बड़ी अदालत में जाइए। कभी तो फैसला होगा? कभी तो कानून का राज होगा? आप के जीवन में ही होगा, न होगा तो आप के बेटे के जीवन में होगा, तब भी न हो तो आप के पोते के जीवन में तो होगा ही। बेटा न हो तो आप बन जाइए 'भोलाराम का जीव' राज कानून का हो न हो आप तो प्रसिद्ध हो ही जाएंगे।

ह सब से आसान तरीका है, कानून के राज को टाँगने का। अदालत खोलो, पर दिखाने के लिए, फिर आड़ में अपना राज चलने दो। गुंडों का राज, लठैतों का राज, नेताओं का राज, सब से ऊपर थैली का राज। 

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Sunday 8 November 2009

जान लें, हाल क्या है? अदालतों का

मेरे नगर में संभाग का श्रम न्यायालय स्थापित है, उसी को औद्योगिक न्यायाधिकरण और केन्द्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के भी अधिकार हैं। इस तरह एक अदालत में तीन अदालतें हैं। यहाँ लंबित मुकदमों की संख्या 4000 से अधिक है।

न मुकदमों में तकरीबन तीन चौथाई मुकदमे निर्देश प्रकरण से उत्पन्न औद्योगिक विवाद हैं और एक चौथाई में अन्य मुकदमे। उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कोटा के मुताबिक एक निर्देश प्रकरण का निर्णय करने के लिए एक न्यायाधीश को दो दिन का समय मिलता है। अन्य मुकदमे के निर्णय के लिए आधे दिन का समय मिलता है। इस एक और दिन में न्यायालय को उस मुकदमे में गवाहियाँ लेनी होती हैं, बहस सुननी होती है और निर्णय लिखाना होता है। इस तरह जो कोटा उच्चन्यायालय ने निर्धारित किया हुआ है वह उचित ही है। क्यों कि इस से कम समय में तो सिर्फ घास काटी जा सकती है किसी विवादित मामले में न्यायपूर्ण निर्णय नहीं किया जा सकता।
म तौर पर फिर भी न्यायालय के जज अपने कोटे का 150 प्रतिशत काम कर लेते हैं। इस तरह उन के काम को अच्छा ही नहीं अपितु प्रशंसनीय कहा जा सकता है। यह तब है, जब कि इस अदालत का एक स्टेनो तीस वर्ष पुरानी टाइप की मशीन पर फैसले टाइप करता है। अभी तक इस अदालत को राजस्थान सरकार ने कंप्यूटर नहीं बख्शा है। हालांकि एक अदद कंप्यूटर की उपलब्धता निर्णयों की संख्या में वृद्धि कर सकती है जिस के लिए अदालत राज्य सरकार को पिछले दस वर्षों से कहती आ रही है।
म गणित करें तो एक वर्ष में 104 साप्ताहिक अवकाश के होते हैं लगभग 20 अन्य अवकाश होते हैं। कुछ दिन जज के द्वारा लिए गए अवकाशों के होते हैं। इस तरह किसी भी सूरत में एक वर्ष में 200 दिन से अधिक काम हो सकना संभव नहीं है। साल के इन 200 दिनों में जज यदि केवल निर्देश प्रकरणों का निपटारा करे तो वह 150 प्रतिशत की दर से 150 निर्देश प्रकरण या फिर 600 अन्य प्रकरणों का निर्णय  कर सकता है। लेकिन हम अनुपात में देखें तो एक जज 140 निर्देश प्रकरण और 40 अन्य मुकदमे निर्णीत करता है। इस तरह वर्ष में वह 180 प्रकरणों का निर्णय करता है। यदि हम मान लें कि वह कुछ और तेज गति से काम करे तो वह 200 मुकदमों का निर्णय कर सकता है और एक चौथाई खरपतवार भी काट दे तो 250 मुकदमों का निर्णय कर सकता है,  हालांकि यह असंभव ही लगता है, अदालत में जज की कुर्सी पर बैठ कर खरपतवार को भी कायदे से काटना पड़ता है।
अब यदि किसी तरह एक जज 250 मुकदमों का निर्णय प्रतिवर्ष करे तो वर्तमान में लंबित 4000 मुकदमों के निपटारे में कम से कम 16 वर्ष तो लगेंगे। अर्थात इस से पहले तो किसी मुकदमे का निर्णय होने की कोई संभावना नहीं है।
क बात और प्रतिवर्ष पांच से छह सौ की संख्या में निर्देश प्रकरण व अन्य प्रकरण इस अदालत में नए प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन निपटारा केवल 250 मुकदमों का होता है इस तरह प्रतिवर्ष लंबित मुकदमों की संख्या 250 से 350 तक बढ़ जाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि अत्यंत प्रयत्नों के बाद भी 200 मुकदमों से अधिक का प्रतिवर्ष निपटारा हो पाना संभव नहीं है। यदि यहाँ एक अदालत और स्थापित कर दी जाए तब भी प्रतिवर्ष बढ़ रही लंबित मुकदमों की संख्या पर लगाम लगाई जा सकती है लेकिन उन्हें कम नहीं किया जा सकता। हाँ मुकदमों के जीवन की लंबाई 16 वर्ष से 8 वर्ष तक लायी जा सकती है। यदि ऐसा हो तो भी कुछ तो राहत न्यायार्थियों को मिले। लेकिन जो सरकार अदालत को एक अदद कंप्यूटर नहीं दे सकती वह एक नयी अदालत की स्थापना के विचार से कितनी कोसों दूर होगी आप खुद अनुमान कर सकते हैं।

ह केवल एक श्रम न्यायालय की स्थिति है। लेकिन सभी अदालतों की यही स्थिति है। कोटा संभाग मुख्यालय पर स्थापित 40 से अधिक अदालतों में से 35 की कमोबेश यही हालत है। इस स्थिति का असर न्याय प्रशासन, जजों, वकीलों, मुवक्किलों (न्यायार्थियों) और समाज पर क्या होता है? इस का आकलन फिर कभी। यदि इस स्थिति की जानकारी से आप को कोई हल्का या भारी सदमा हुआ हो तो पहले उस से बाहर निकल लें।

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